भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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तृतीयपटलः । ( ७३ )

टीका-पूर्वोक्त क्रमस प्राणायाम जब तीन घडीतक स्थिर होजायगा तब योगीको उसके इच्छाके अनुसार सब सिद्ध होजायगा यह निश्चय है ॥ ६२ ॥ मूलम्-वाक्सिद्धिः कामचारित्वं दूरदृष्टि- स्तथैव च ॥ दूरश्रुतिः सूक्ष्मदृष्टिः परका- यप्रवेशनम् ॥६३॥ विण्मूत्रलेपने स्वर्णम- दृश्यकरणं तथा ॥ भवन्त्येतानि सर्वा- णि खेचरत्वं च योगिनाम् ॥६४॥ टीका-वाक्यसिद्धी स्वेच्छाचारी दूरदृष्टी दूर शब्द श्रवण अतिसूक्ष्म दर्शन दूसरेके शरीरमें प्रवेश करने- की शक्ति होय और योगी अन्यधातुमें अपने मल मूत्र लेपनमात्रसे स्वर्ण करे और योगीको अदृश्य होजाने की शक्ति और आकाशमें गमन करनेकी सिद्धि यह सब योगीको कुम्भक सिद्ध होजानेसे स्वयं सिद्ध हो- जायगा इसमें संशय नहीं है ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ मूलम्-यदा भवेद्घटावस्था पवनाभ्यासने परा ॥ तदा संसारचक्रेऽस्मिंस्तन्नास्ति यन्न साधयेत् ॥ ६५ ॥ टीका-जब योगींकी घटावस्था होगी अर्थात् उसमें