शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयपटलः । ( ७५ )
जय हो जायगी अर्थात् जैसे नेत्रसे रूपका बोध होताहै तो जब रूपमें आत्मभावना होगी तब उस भावनासे चक्षु इन्द्रिय रूपमें कदापि आसक्त न होगी जब वह आसक्त न भई तब वह इन्द्रिय आपही जय होगई ॥६८॥ मूलम्-याममात्रं यदा पूर्णं भवेदभ्यासयो- गतः॥एकवारं प्रकुर्वीत तदा योगी च कु- म्भकम्॥६९॥दण्डाष्टकं यदा वायुर्निश्च- लो योगिनो भवेत् ॥ स्वसामर्थ्यात्तदांगु- ष्ठे तिष्ठेद्वातुलवत्सुधीः ॥ ७० ॥ टीका-जब एकवारमें पूर्ण एक प्रहरतक योगीका अभ्याससे कुम्भक स्थिर रहेगा अर्थात् आठ घडीतक योगीका वायु निश्चल रहे तब वह अपने सामर्थ्यसे अङ्गु- ष्ठमात्रके बलसे अचल अबोधवत् खडा रहसक्ता है अर्थात् यह सामर्थ्य भी योगीको होगी और अपने सा- मर्थ्यको गोप्य रखनेके हेतु विक्षिप्तकी चेष्टा योगी दिख लावैगा ॥ ६९ ॥ ७० ॥ मूलम्-ततःपरिचयावस्था योगिनोऽभ्यास- तो भवेत् ॥यदा वायुश्चंद्रसूर्यं त्यक्त्वा ति- ष्ठति निश्चलम् ॥ ७१ ॥ वायुः परिचितो वायुः सुषुम्ना व्योम्नि संचरेत् ॥