भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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तृतीयपटलः । ( ७७ ) टीका-इस कर्मकूटको योगी प्रणवद्वारा नाश कर- देताहै और यदि पूर्वकृत कर्मफल भोगनेकी इच्छा करे तो अपने इच्छानुसार इसी जन्ममें इसी शरीरसे भोगलेगा ॥ ७४ ॥ मूलम्-अस्मिन्कालेमहायोगी पंचधा धा- रणं चरेत् ॥ येन भूरादिसिद्धिः स्यात्ततो भूतभयापहा॥७५॥आधारे घटिकाः पंच- लिंगस्थाने तथैव च ॥ तदूर्ध्वं घटिकाः पञ्च नाभिहृन्मध्यके तथा ॥७६॥ भ्रूम- ध्योर्ध्वं तथा पंच घटिका धारयेत्सुधीः ॥ तथा भूरादिना नष्टो योगीन्द्रो न भवे त्खलु ॥ ७७ ॥ टीका-जिसकालमें महायोगी पञ्चधाधारणा सिद्ध करलेगा तब यह पञ्चभूत सिद्ध होजायेंगे और इनसे कोई कष्टका भय नहोगा. अब धारणाका निर्णय करतेहैं कि, आधारचक्रमें पांचघडी वायु धारणकरे इसी क्रमसे स्वाधिष्ठान मणिपूर अनाहत विशुद्ध आज्ञाचक्रमें अर्थात् गुदा लिङ्ग नाभि हृदय कंठ भृकुटीके मध्यमें ऊपर कहेहुए प्रमाणसे वायु धारणकरेगा तो योगी पञ्च भूतसे निश्चय नाश न होगा ॥ ७५ ॥ ७६ ॥ ७७ ॥