शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४ : शिवसूत्र विमर्श व्याख्या—तीन मलों को, जिन से आवृत होने के कारण जीवभाव प्राप्त हुआ है, हटाने और समस्त जगत् में परिपूर्ण अहं-परामर्श करने में उद्योग करना चाहिये। क्षण- मात्र में स्पन्दशक्ति के उच्छलन से स्वात्म संवित् का अनुभव होता है। सारा जगत् इसी प्रतिभा में डूब जाता है। सारे विश्व में पूर्णाहन्ता का अभ्यास करने से समस्त शक्तियों का प्रादुर्भाव होता है जिससे समस्त विकल्पों का भेदन होता है और कोई मल नहीं दबा सकता है। इसी को भैरवभाव या भैरवसमाधि कहते हैं। भैरवरूप इस स्वस्वरूप को प्रकट करने के लिये स्वरूप-संवित् के विमर्श में नित नयेपन का अनुभव होता है। श्रुतपूर्व अनुभव से अभ्यास फलित नहीं होता है। जैसे अष्टावक्रगीता में कहा है : 'मूढो नाप्नोति तद्ब्रह्म यतो भवितुमिच्छति' अर्थात् मूढ़पुरुष योगाभ्यासरूप कर्म करके (देहाभिमान दूर होने के बिना ही) ब्रह्मरूप होने की इच्छा करता है इस कारण ब्रह्म को प्राप्त नहीं होता है। अतः साधक को सावधान रहना चाहिये। जब तक देहाभिमान दूर न हो जाये तब तक धीर बन कर अभ्यासपथ पर नित नये अनुभव करते हुए अग्रसर होने के उद्यम में रहना आवश्यक है। अष्टावक्र जी राजा जनक को आगे कहते हैं : 'अनिच्छन्नपि धीरो हि परब्रह्मस्वरूपभाक्' अर्थ—धीर पुरुष मोक्ष की इच्छा न करता हुआ भी परब्रह्म के स्वरूप को प्राप्त होता है क्योंकि उसका देहाभिमान दूर हुआ होता है। 'तावद्वै ब्रह्मवेगेन मथनं शक्तिविग्रहे' (तब तक, निश्चय ही, ब्रह्मवेग-समाधि१ से ही शक्ति-समूह का मथन करना चाहिये।) अतः पूर्णाहन्ता के विमर्श में साधक को इतना अभ्यासशील रहना चाहिये कि उसे जाग्रत् अथवा व्युत्थान दशा में भी भेद का आभास तक न रहे। ऐसा विमर्श साधक को शक्तिपात द्वारा ही प्राप्त होता है। स्वरूपोपलब्धि के लिये मलत्रय हटाने की अत्यन्ता- वश्यकता है। इसके लिये साधक को तत्पर रहना चाहिये। महिम्नस्तोत्र में कहा है : 'नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव' १. हठपूर्वक नियम-बद्ध होकर परब्रह्मस्वरूप के चिन्तन में लगे रहना ब्रह्मवेग-समाधि है। इसी की ओर संकेत देखिये रामगीता में— यावन्न पश्येदखिलं मदात्मकं, तावन्मदाराधनतत्परो भवेत् । (रामगीता-५८)