भारतकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 108 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 30

६ : शिवसूत्र विमर्श में कोई अन्तर नहीं रहता । वह यथास्थित अवस्था में स्वरूप संवित् के चमत्कार का आनन्द लेता है । कहा भी है : “यथास्थितः तथैवासुः मा गा बाह्यं तथान्तरम् ।” केवलं चिद्विकासेन विकारनिकराञ्जहि ॥७॥ सम्बन्ध—अब अगले तीन सूत्रों में जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के लक्षण क्रम से कहते हैं । ज्ञानं जाग्रत् ॥८॥ ज्ञानं—(बाह्य इन्द्रियों से पैदा हुआ) सर्वसाधारण अर्थ के विषय-वाला ज्ञान जाग्रत्—जाग्रत् (अवस्था कहलाती है) । व्याख्या—जागते हुये भी यदि जीव को कभी असाधारण अर्थ के विषय का अस्फुट विवेक हो तो उसे 'जाग्रत् में स्वप्न' कहते हैं । जाग्रत् अवस्था में ही हम कभी कुछ कहने को उद्यत होते हैं परन्तु इसका अस्फुट-विवेक भी कभी विस्मृति में जाने के कारण कहा नहीं जाता, इसे जाग्रत्-सुषुप्ति कहते हैं । अतः जागते हुए सभी दशाओं में जाग्रत् अवस्था नहीं होती है । जाग्रत् केवल बाह्य इन्द्रियों से पैदा हुआ सर्वसाधारण अर्थ के विषय का ज्ञान है ॥८॥ स्वप्नो विकल्पाः ॥९॥ स्वप्न :—स्वप्नावस्था विकल्पा :—मनोमात्र से पैदा हुए असाधारण अर्थों का विषय (है) । व्याख्या—अस्फुट-विवेक को ही स्वप्न कहते हैं । यह केवल मन के विकार से ही होता है । स्वप्न में बाह्य इन्द्रिय किसी काम के नहीं होते, वहाँ मन के कल्पित इन्द्रिय ही कल्पित अथवा असाधारण अर्थों को विषय करते हैं । इस अवस्था में स्पष्ट विवेक नहीं रहता । जाग्रत् के शरीर की वर्तमान दशा का ज्ञान बहुत ही अस्फुट रहता है । इस अवस्था की दशायें भी स्वप्न-जाग्रद् तथा स्वप्न-सुषुप्ति के रूप में भिन्न- भिन्न होती हैं ॥९॥ अविवेको माया सौषुप्तम् ॥१०॥ अविवेकः—विवेकराहित्य (अथवा निश्चित बुद्धि का न रहना, तथा) माया—मोह (गाढ़ तम) सौषुप्तम्—सुषुप्ति अवस्था (कहलाती है) । व्याख्या—विवेक-बुद्धि के अभाव को अख्याति कहते हैं । यह अख्याति मोह में पड़ने से होती है । इसी अवस्था को सुषुप्ति कहते हैं । इस में विवेक नहीं रहता । यह गाढ़ तमोगुण अवस्था है ॥१०॥

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 30, कुल 108 में से · BharatKosha