भारतकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 108 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 32

८ : शिवसूत्र विमर्श रूप समुद्र की कोई परिधि नहीं होती । स्वात्मानन्द में अतृप्त होने से उससे यह आश्चर्य प्रकट होते हैं । 'सुखे दुःखे विमोहे च स्थितोऽहं परमः शिवः' अर्थ—सांसारिक सुख (सत्त्व) दुःख (रजस्) और मोह (तमस्) की अवस्थाओं में भी मैं परमशिव स्वरूप ही ठहरा हूँ ॥१२॥ सम्बन्ध—ऐसे योगी की इच्छा को कोई शक्ति रोक नहीं सकती । इच्छाशक्तिरुमा कुमारी ॥१३॥ इच्छाशक्तिः—(ऐसे योगी की) इच्छाशक्ति उमा—परा-रूप पारमेश्वरी स्वातन्त्र्य शक्ति (है) कुमारी—(और वही) विश्व के सर्जन तथा संहार करने की क्रीडा में तत्पर है । व्याख्या—तुर्यातीत योगी की इच्छा शक्ति, शक्तिपात द्वारा प्राप्त हुई युक्ति से पर-भैरवरूप ही होती है । उसी विश्व के सर्जन तथा संहार में क्रीड़नशीला शक्ति के योग से वह सारे दृश्यजगत् में अप्रतिहत (बेरोक) स्वातन्त्र्यमय हो जाता है । वह सदाशिव से पृथ्वी तत्त्व तक सारे दृश्यवर्ग को अपना अङ्ग (स्वरूप) ही देखता है । उसे आवरण-रहित चिद्घनरूप का स्फुरण होता है । 'या अस्य इच्छा सा अस्य शक्तिः सा च कुमारी' अर्थ—जो इसकी इच्छा है वही इसकी पारमेश्वरी शक्ति है और वही जगत् के सृष्टि-स्थिति रूप क्रीडा में तत्परता है ॥१३॥ सम्बन्ध—ऐसे प्रभाववाली इच्छाशक्ति से युक्त योगी के लिये दृश्यवर्ग अपना स्वरूप होता है, ऐसा कहते हैं । दृश्यं शरीरम् ॥१४॥ दृश्यं—(जगत् में जो) दृश्य पदार्थ (हैं) शरीरम्—(वह उसका) स्वरूप (है) । व्याख्या—जो बाह्य (घटपटादि, नीलपीतादि) तथा आभ्यन्तर (देहादि) जगत्रूप दृश्य अर्थात् वेद्यवर्ग है वह सब यह अपने स्वरूप से अभिन्न अनुभव करता है । सारे दृश्य पदार्थ को अहंरूपता से देखता है । सारे विश्व को अपना शरीर जानता है । यह समझने के लिये एक कथा प्रस्तुत की जाती है—एक बार इन्द्र अपनी सभा में प्रसन्न होकर विराजमान थे । नर्तकियां नृत्य करती थीं । गायक संगीत से आह्ला- दित करने में व्यस्त थे । सामने दो हाथी आपस में एक दूसरे से टकराने का विनोद करते थे । इन्द्र यह सब देखकर आनन्दित था । इतने में भगवान् शिव उधर आ