शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय विकास : १५ लिए इतने प्रयत्न की आवश्यकता है कि अभ्यास स्वाभाविक बन जाय। शकुनि पक्षी में यह स्वाभाविक है कि ज्यों ही उसकी दृष्टि दूर भी पड़े हुए मांस के टुकड़े पर पड़ जाय तो बह वेग से (और सब कुछ भूल कर) उस पर झपट पड़ता है। इसी प्रकार योगीन्द्र का मन पर-प्रकाश को सहज ही ग्रहण करता है। अतः अभ्यास को स्वाभाविक बनाने के लिए उद्योग की आवश्यकता है ॥२॥ संबन्ध—इस प्रकार के साधक के साध्य-मन्त्र के वीर्य अर्थात् शक्ति के बारे में, जिसका उपक्षेप पहले विकास के २२वें सूत्र में किया है, आगे के सूत्र में बताते हैं ! विद्याशरीरसत्ता मन्त्ररहस्यम् ॥३॥ विद्या—पराद्वयप्रथा (जिसे शब्दराशि—भैरव कहते हैं) शरीर—स्वरूप (है जिसका) सत्ता—(उसकी जो) सत्ता (अर्थात् सारे विश्व के साथ अभेद रखने वाला पूर्णाहन्ता का विमर्शरूप विकास है) मन्त्ररहस्यम्—(वही) मन्त्रों का वीर्य है। व्याख्या—पहले विकास के २२वें सूत्र में शाम्भवोपाय के आधार पर जो बोध- सुधाब्धि के साथ तादात्म्य के विमर्श से पूर्णाहंता में प्रवेश कहा गया है वही अब शाक्तो- पाय के द्वारा शब्दराशि भैरव के स्वरूप में विश्व के साथ अभेद रखने वाली पूर्णाहन्ता के विमर्श के विकास में बताया जाता है। यह अ-क्षकारात्मक पचास अक्षरों की स्थिति रूप सारी शब्दराशि का समन्वय है। इसका विशद वर्णन तन्त्रालोक में मातृकाचक्र तथा न-फकोटि (मालिनी) के वर्णन में आचार्याभिनवगुप्तपाद द्वारा विशद रूप से किया गया है। शब्द ही चराचर में व्याप्त है और इसी से चराचर वाच्य है। यह शब्द हृदय में एक अणु (पश्यन्ती), कण्ठ में दो अणु (मध्यमा) और जिह्वाग्र पर तीन अणु (वैखरी) होकर वर्णों के द्वारा प्रकट होता है। इसकी पर तथा सूक्ष्म शक्ति सब प्राणियों में ठहरी हुई है जो हृदय-बिन्दु (हृद्बिन्दु) अर्थात् चित्त-प्रकाशरूप साढ़े तीन वलय वाली कुण्डलिनी को ढाँप कर सुषुप्त भुजगाकार है। जब प्राणापान संघर्ष-रूप दृढ़ साधना से यह पराशक्ति जाग्रत् होती है तब प्राण-शक्ति समूह से नाद द्वारा प्रकट होती है। अर्थात् पर-ज्ञानरूप निनाद द्वारा प्रबुद्ध होती है और शरीर केन्द्र से बाह्य व्याप्त होती है। यह नाद सचेत साधक को जाग्रत् और स्वप्न तथा स्वप्न और सुषुप्ति की सन्धियों में सुनाई देता है और उसे शुद्ध निर्विषय भाव में अद्वयानन्द की अनुभूति होती है। भगवत्पाद श्री शङ्कराचार्य ने इसका संकेत इस प्रकार किया है :— यद्भावानुभवः स्यान्निद्रादौ जागरस्यान्ते। अन्तः स चेत्स्थिरः स्याल्लभते तदाद्वयानन्दम्॥ —प्रबोधसुधाकर : श्लोक १६०