भारतकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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द्वितीय विकास : १९ 'शरवत् संहितो भवेत्' अर्थ—जिस प्रकार तीर अपने लक्ष्य पर अति वेग से जा लगता है उसी प्रकार ऐसे योगी का चिदात्मस्वरूप में मज्जन होता है, यही योगी की परम सिद्धि है। इसी अवस्था के लिये आचार्य उत्पलदेव ने भगवान् शिव से प्रार्थना की है— त्वद्विलोकनसमुत्कचेतसो योगसिद्धिरियती सदास्तु मे। यद्विशेयमभिसन्धिमात्रत्- स्त्वत्सुधासदनमर्चनाय ते ॥ —(शिवस्तोत्रावली २२-६) अर्थ—हे परमेश्वर ! तुम्हारे दर्शन के लिये उत्कण्ठित हृदयवाले मुझे इतनी सी ही योग-सिद्धि सदा प्राप्त होती रहे कि मैं केवल इच्छा होते हुए ही (अर्थात् जब मैं चाहूँ तब) तुम्हारी पूजा करने के लिए तुम्हारे चिदानन्द-सदन (अर्थात् परमानन्द धाम) में प्रवेश करूँ ॥ ऐसे परम सिद्ध योगी की सिद्धियां उसका अनुसरण करती हैं परन्तु वह उनकी ओर देखता तक भी नहीं। परम भक्त सन्त परमानन्द महाराज ने क्या सुन्दर कविता इस संदर्भ में कश्मीरी भाषा में कही है : 'पत् ल़ारन्स् ऋद् त् सिद्ध स्योद् वुछ्यक् न् जांह्' अर्थ—ऋद्धि और सिद्धि योगी का पीछा करेंगी परन्तु वह उनकी ओर एक आंख भी नहीं देखेगा। श्रुति के अनुसार ऐसे योगी का अनुभव—'सवं इदं अहं च ब्रह्मैव' (अर्थात् यह सर्व चराचर विश्व ओर मैं ब्रह्म ही हैं) इस प्रकार स्वरूप चमत्कार पूर्ण होता है। काश्मीर शैव-दर्शन में इसे कुलमार्ग कहते हैं। कुलरूप परमशिव हैं। 'कुल' का अर्थ है 'विश्वाभेद अवस्था' । इसी से इसको 'कौल' अर्थात् 'त्रिक' नाम दिया गया है। यहाँ सब प्रकार के क्षोभ का लय होता है। इस प्रकार मन्त्रवीर्य स्वरूप के कथन द्वारा मुद्रा- वीर्य का भी संग्रह हो गया। तन्त्रालोक में श्रीअभिनवगुप्तपाद इसे जगदानन्द की संज्ञा देते हैं। यह स्थिति इस प्रकार है :— यत्र कोऽपि व्यवच्छेदो नास्ति यद्विश्वत: स्फुरत् । यदनाहतसंवित्ति परमामृतबृंहितम् ॥ यत्रास्ति भावनादीनां न मुख्या कापि संगतिः । तदेव जगदानन्दमस्मभ्यं शम्भूरुचिवान् ॥ —(तन्त्रालोकः)