शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय विकास : २३ सम्बन्ध—परन्तु जब वह योगी सतत रूप से समाहित नहीं रहता है तब ज्ञानवान् होकर भी उसे रुकावट (स्वरूप में स्वेच्छानुसन्धान की कमी) रहती है; इस पर कहते हैं । विद्यासंहारे तदुत्थस्वप्नदर्शनम् ॥१०॥ विद्यासंहारे—शुद्ध विद्या के संहार (लोप) होने पर तदुत्थ—उससे निकल कर स्वप्न--भेदमय विकल्प प्रपञ्च-रूपता में दर्शनम्—मज्जन होता है । व्याख्या—शुद्धविद्या के एक बार उदय होने पर उसका अभ्यास सदा उत्थित रहता है । परन्तु एक बार असावधानी हो तो विक्षेप आता है । योगी तब स्वप्नरूप भेद में जाता है । अर्थात् वह भेदमय विकल्प प्रपञ्च में डूब कर त्रिशङ्कु की तरह, जो शापवश आकाश और पृथ्वी के बीच में लटका रहा, अर्धनिमग्न ही रहता है । वह जाग्रत् के विकल्पमय-भ्रम से स्वप्न में जाता है और पूर्णता से वञ्चित ही रह जाता है । अतः योगी को यहाँ सावधानी से अभ्यास में रहना चाहिये ॥१०॥ इस प्रकार शिवसूत्र का शाक्तोपाय प्रकाश नामक द्वितीय विकास समाप्त हुआ