शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय विकास : ३५ रङ्गोऽन्तरात्मा ॥१०॥ रङ्गः—(योगी के प्रपंच की नाना अवस्थाओं में) खेल का स्थान अन्तरात्मा—(प्राण-प्रधान) पुर्यष्टक से नियन्त्रित जीव है । व्याख्या—स्वरूप के संकोच का अवभासन कराने वाला तत्त्व शून्य-प्रधान अथवा प्राण-प्रधान पुर्यष्टक है । यही अन्तर जीव है । इसी के द्वारा योगी जगत् का भास देने वाली क्रीड़ा करता है। सूक्ष्म शरीर में ठहरा हुआ ही वह अपनी इन्द्रियों के स्पन्दन-क्रम से जगत् के नाटक का अवभासन करता है। शिवव्याप्ति को प्राप्त योगी अहंता और इदंता, अन्तर और बाह्य में चिद्विमर्श की समरसता का अनुभव करता है। साधारणरूप में पुर्यष्टक-प्रमातृता स्वप्न अवस्था में ही प्रकट होती है ॥१०॥ सम्बन्ध—इस प्रकार पुर्यष्टक रूप आत्मा द्वारा रङ्गमञ्च पर नर्तन करने वाले योगी के दर्शक कौन हैं, इस प्रकार कहते हैं । प्रेक्षकाणीन्द्रियाणि ॥११॥ इन्द्रियाणि—योगी की चक्षुरादि इन्द्रियाँ (संसार नाटक को प्रकट करने के आनन्द में) प्रेक्षकाणि—दर्शक (स्वस्वरूप को अन्तर्मुख भाव से साक्षात् कराने वाली) हैं। व्याख्या—जैसे रंगमंच पर खेलने वाले नट के नाटक का आस्वादन करने वाले रंगशाला में बैठे दर्शक होते हैं वैसे स्वस्वरूप में ठहरा हुआ योगी नट है जो अन्तरात्मा अर्थात् पुर्यष्टक रूप रंगमंच पर अहंता और इदन्ता में चिद्विमर्श की समरसता से संसार- नाटक इन्द्रिय-स्पन्दन के क्रम से अवभासित (प्रदर्शन) करता है । अतः चक्षुरादि इन्द्रियाँ इस नाटक के दर्शक हैं। तात्पर्य यह है कि उसकी चक्षुरादि इन्द्रियाँ संसार नाटक को प्रकट करने के आनन्द में मग्न होकर ही स्वस्वरूप का अन्तर्मुखभाव से साक्षात्कार करतीं हैं । इस प्रकार इन्द्रियाँ चमत्कार-रस के सम्पूर्ण आनन्द को प्राप्त करती हैं। श्रुति कहती है : ‘कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षद् आवृत्तचक्षुरमृतत्वमश्नन्’ ॥—कठ० उप० । २-१-१॥ अर्थ—कोई धैर्यवान् (योगी) ही चक्षुरादि इन्द्रियों को अन्तर्मुख करके स्वस्वरूप का साक्षात्कार कर अमृत-पद को प्राप्त करता है । और भी : ‘यत्र यत्र मिलिता मरीचयः तत्र तत्र प्रभुरेव जृम्भति’