भारतकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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तृतीय विकास : ४१ व्याख्या—जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं में चौथी अवस्था, जो शुद्धतत्त्व के प्रकाश वाला तुर्यानन्द रूप तेज है, तेल की तरह अधिक फैलाना चाहिए। तीनों अवस्थाओं की उन्मेष तथा उपशान्ति दशाओं में भी आदि और अन्त कोटि की मध्यदशा को ग्रहण कर चिद्घनता को व्याप्त करना चाहिये, जिससे चिद्घनरूप परमामृत समुद्र में तन्मयीभाव प्राप्त हो । पहले विकास में 'जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तेषु तुर्यभोगसंभवः' (१.७) इस सूत्र से सूचित किया गया है कि विश्व संवित् की व्याप्ति का अनुभव करने में उद्यम ही उपाय है—'उद्यमो भैरवः' (२.५) । तब योगी शक्तिचक्र के अनुसन्धान से जाग्रदादि अवस्थाओं के अन्तर्गत खाते हुए, जाते हुए, सोते हुए आदि व्यवहारों में भी आत्मस्फुरण के अनुभव का चमत्कार प्राप्त करता है। यही तुर्यावस्था है। आगे एक और सूत्र—'त्रितयभोक्ता वीरेशः' (१-११)—में शाम्भवोपाय के उपयुक्त हठपाक युक्ति से जाग्रदादि का संहार दिखाया गया है। इस प्रकार के अनुभव वाला योगी केवल चिन्मात्र ही रहता है। वह अपने संवित्सांम्राज्य के वैभव में भेदजगत् को ग्रास करने वाले वीरों में उत्तम वीर है क्योंकि वह प्रवणशील अन्तःकरण तथा बहिष्करण का अधीश्वर होता है। परन्तु तृतीय विकास के इस सूत्र में आणवोपाय के उपयुक्त धारणा की युक्ति से जाग्रदादि तीनों अवस्थाओं को तुर्यरूप रस से सिंचित करने के अभ्यास की ओर ही संकेत है ॥२०॥ सम्बन्ध—अब इन तीनों अवस्थाओं में तुर्यरस के सेचन का उपाय कहते हैं। मग्नः स्वचित्तेन प्रविशेत् ॥२१॥ स्वचित्तेन—असंकुचित चिति द्वारा तादात्म्यता के ज्ञान से मग्नः—(शरीर प्राण आदि में अहंरूपता का शमन करते हुए) अविकल्प रूप में प्रविशेत्—अन्तर्मुख होना चाहिए। व्याख्या—तुर्य दशा में प्रवेश करने का प्रकार नेत्रतन्त्र में यूं कहा है : प्राणादिस्थूलभावं तु त्यक्त्वा सूक्ष्ममथान्तरम् । सूक्ष्मातीतं तु परमं स्पन्दनं लभ्यते यतः ॥ अर्थ-अभ्यास काल के आरम्भ में प्राणादि स्थूल भाव (प्राणायाम, ध्यान, धारणादि) का परिपाक होने से उनको योगी त्याग देता है। फिर सूक्ष्म भाव में प्रवेश करके मध्यपथ से वह सूक्ष्मातीत दशा का अनुभव करता है जो प्राण के आलम्बन से परे होती है क्योंकि उस दशा में चित्स्फाररूप रस का परस्पन्द ही रहता है।