भारतकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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५० : शिवसूत्र विमर्श सम्बन्ध—योगी के विषय में उसके व्रत और जप का वर्णन करके उसकी चर्या के बारे में कहते हैं । दानमात्मज्ञानम् ॥२८॥ आत्मज्ञानम्—आत्मज्ञान पर रहना (अथवा शिष्यों को आत्मज्ञान प्रदान करना) ही दानम्—योगी का दान करना है। व्याख्या— संसिद्ध योगी का चैतन्यरूप आत्मा का ज्ञान अर्थात् साक्षात्कार ही दान है। दान के यहाँ कई अर्थ बताये हैं यथा— (१) दीयते परिपूर्णं स्वरूपम्—परिपूर्ण स्वरूप अर्थात् पूर्णाहन्ता को प्राप्त कराता है । (२) दीयते खण्ड्यते विश्वभेदः—पृथ्वी तत्त्व से शिव तत्त्व तक ३६ तत्त्व लक्षण वाले भेद को काट देता है । (३) दीयते शोध्यते मायास्वरूपम्—माया के स्वरूप का शोधन करता है । (४) दीयते रक्ष्यते लब्धः शिवात्मा स्वभावश्च अनेन—प्राप्त किये शिवस्वरूप के स्वभाव की (निरन्तर अभ्यास द्वारा) रक्षा करता है । और (५) दीयते इति दानम्—अन्तेवासियों (शिष्यों) को आत्मज्ञान ही देता है। इसके बारे में कहा है : दर्शनात्स्पर्शनाद्वापि वितताद्भवसागरात् । तारयिष्यन्ति योगीन्द्राः कुलाचारप्रतिष्ठिताः ॥ अर्थ—शैव सिद्धान्त में प्रतिष्ठित योगीन्द्र (मुमुक्षुजनों को इस) विस्तृत भवसागर से अपने दर्शन से या चरण-स्पर्श के प्रभाव से पार कर देते हैं यही उनका उत्तम दान है ॥२८॥ सम्बन्ध—शिव के साथ सदा तुल्य योगी इस प्रकार व्रत, जप और चर्या में लगा रहने से अपनी इन्द्रिय-वृत्तियों पर आरूढ होता है। वही तत्त्व का उपदेश चाहने वाले शिष्यों को स्वस्वरूप की पहचान का ज्ञान दे सकता है । श्रुति के अनुसार 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य द्वारा आत्मज्ञान की उपलब्धि कराता है। इसी विषय में आगे का सूत्र है। योऽविपस्थो ज्ञाहेतुश्च ॥२९॥ यः—जो (योगी) अविपं—परमेश्वर के शक्ति-चक्र की घोरतरी शक्तियों (अर्थात् इन्द्रिय- वृत्तियों) पर स्थः—प्रभुत्व जमाता (अर्थात् वश रखता) है