भारतकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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५६ : शिवसूत्र विमर्श सम्बन्ध—क्योंकि जीवभाव से उत्तीर्ण इस योगी के अन्तःकरण को सुख दुःख स्पर्श नहीं करते, इसलिए वह— तद्विमुक्तस्तु केवली ॥३४॥ तत्—संस्कार शेष रहने तक तु—विशेष कर विमुक्तः—सुख-दुःख से मुक्त (होकर) केवली--केवल अद्वैतनिष्ठ रहता है। व्याख्या—स्वरूपनिष्ठ होने से योगी को संस्कार मात्र में भी सुख-दुःख स्पर्श नहीं कर पाते। वह विशेष रूप से इनसे मुक्त होता है। वह चिन्मात्र स्वरूप सदा अद्वैत- निष्ठ ही रहता है। यह श्रीकालिकाक्रम में इस प्रकार वर्णित है : सुखदुःखादिविज्ञानविकल्पानल्पकल्पितम् । भित्त्वा द्वैतमहामोहं योगी योगफलं लभेत् ॥ अर्थ—सुख, दुःख और मोहज्ञान के विकल्पों से घनीभूत द्वैत के महामोह को चीर कर योगी योग के फल स्वरूप लाभ में ही सदा रहता है । यहाँ 'तु' शब्द से आगे कहे जाने वाले अज्ञानी की अपेक्षा ज्ञानी में विशेषता कही गई है ॥३४॥ सम्बन्ध—अतः इस के विपरीत जीवदशा में पुरुष शुभ तथा अशुभ के कलंक से कर्मात्मा कहा गया है। इस का वर्णन करते हैं। मोहप्रतिसंहतस्तु कर्मात्मा॥३५॥ तु--इसके विपरीत मोहप्रतिसंहतः--अज्ञान से पूरी तरह घनीभूत होकर कर्मात्मा—(वह) साधारण जीव अर्थात् कर्म-पिण्ड ही होता है। व्याख्या—परन्तु अज्ञान के आवरण से पुरुष जीव ही होता है योगी नहीं। वह सुख दुःख के ही आश्रित रहता है और सदा कर्म में लगा हुआ शुभ फल और अशुभ फल से कलंकित होता है। वह अविद्या के प्रभाव से विकल्पों के ही अनुसार चलता है और स्वरूप में सुख-दुःख का साक्षात्कार नहीं करता है ! कहा भी है— 'अज्ञानैकघनो नित्यं शुभाशुभकलंकितः' अर्थ—केवल अज्ञान में घनीभूत होकर (साधारण जीव) सदा शुभ तथा अशुभ वासनाओं (मायीयमल) से कलंकित रहता है ॥३५॥