भारतकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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तृतीय विकास : ६३ (३) छींकते समय छींक आने से पहले और छींकने के अनन्तर ही सावधान रहना चाहिए। (४) अपने किसी दूरस्थ प्रियजन की याद आते समय पूर्वापर ज्ञानरहित जो आनन्द-दशा है उसमें ठहरना चाहिए। (५) सोते समय निद्रा लगने से पूर्व और जाग्रत् के अन्त में मध्य-दशा पर ठहरने का प्रयत्न करना चाहिए १ ॥३८॥ सम्बन्ध—अतः योगी साधक को चाहिए कि वह इस प्रकार तीनों अवस्थाओं में अन्तर्मुख भाव से मध्य-दशा का अनुप्राणन करने की स्थिरता प्राप्त कर ही संतुष्ट न रहे, अपितु उसे बाह्यरूपता में भी यह अभ्यास दृढ़ करना चाहिए। इस विषय में अगला सूत्र है। चित्तस्थितिवच्छरीरकरणबाह्येषु ॥३९॥ चित्तस्थिति—(जिस तरह) चित्त की अन्तर्मुख निरुद्ध अवस्था (स्वाभाविक हुई है) वत्—(उस) की तरह शरीर—(व्यक्तिगत शरीर में) जाग्रत्, (और) करण—(व्यक्तिगत शरीर में) स्वप्न (अवस्थाओं) के बाह्येषु—बाह्य जगत् रूप सुषुप्ति को भी (तुर्य रस से अनुप्राणित करना चाहिए)। १. स्वामी जी महाराज ने इस विषय में अपने अनुभव को भी प्रकट किया है— There is a point be-twixt sleep and waking, where thou shalt be alert without shaking; Enter into the new world where forms so hidepus pass, They are passing, endure, do not be taken by the dross. Then the pulls and pushes about the tolerate. Close all ingress and egress; Yawnings there may be; Shed tears-crave-implore, But thou wilt not prostrate, A ‘THRILL’ passes, and that goes down to the bottom, It riseth, may it bloom forth, that is BLISS : Blessed Being, Blessed Being— O ! greetings be to THEE. By Swami Lakshaman Joo.

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