शिवदृष्टि (सोमानन्दनाथ - उत्पलदेवाचार्य वृत्ति सहित काश्मीर प्रत्यभिज्ञा मूल दर्शन सटीक)
Shivadrishti of Somanandanatha with Utpaladeva Vritti
सोमानन्दनाथ (वृत्ति: उत्पलदेव) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका श्रीसोमानन्दप्रभुपाद द्वारा विरचित इस 'शिवदृष्टिः' नामक प्रस्तुत ग्रन्थरत्न में सात आह्निक हैं और कुल ७२१ श्लोक अनुष्टुप् छन्द में विद्यमान हैं। प्रथम आह्निक में स्वात्मस्वरूप परमशिव के प्रति नमस्कार के अनन्तर 'आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन्निर्वृतचिद्विभुः। अनिरुद्धेच्छाप्रसरः प्रसरद्दृक्क्रियः शिवः' ।। १-२ ।। एक ही श्लोक में सूत्ररूप से समस्त शास्त्रार्थ का सयुक्तिक प्रतिपादन कर, परमशिवदशा से लेकर घट-पटादि पर्यन्त शिवरूपता की स्थिति का उल्लेख किया गया है। परमशिवतत्त्व का स्वरूप, उसका विश्वोत्तीर्णदशा में भी विश्वात्मक रूप से अवस्थान, शैवकारणवाद एवं सृष्टिप्रक्रिया आदि का विवेचन किया गया है। द्वितीय आह्निक में ईश्वर अद्वयवाद ही युक्तियुक्त अनुभवसिद्ध है। वैयाकरणों के शब्दाद्वैत का स्वरूप कथन और उसका युक्तिपूर्वक निराकरण किया है तथा इसमें विवर्तवाद का खण्डन किया गया है एवं भर्तृहरि को पश्यन्ती को परा मानने का खण्डन है। तृतीय आह्निक में भट्ट प्रद्युम्न द्वारा स्वीकृत शाक्तवाद, शिवाद्वायवाद के प्रतिपक्षी द्वैतवादी शैव और पातञ्जल मत के अनुयायियों के सहित इक्कीस मत-मतान्तरों का दोषोद्भावनपूर्वक खण्डन एवं अपने शैव अद्वैत सिद्धान्त का युक्तिपूर्वक मण्डन किया है। चतुर्थ आह्निक में अन्य दर्शनों की प्रत्यभिज्ञादर्शन के विषय में संभावित शङ्काओं का निराकरण कर 'अथेदानीं प्रवक्तव्यं यथा सर्वं शिवात्मकम्'। इत्यादि पद्यों से परमशिव की सर्वरूपता का विवेचन करते हुए शैवसिद्धान्त के मूलभूत तत्त्व तथा शैव सर्वेश्वरवाद को दिखाया है यह सारा विश्व प्रपञ्च का विस्तार शिव द्वारा ही आभासित होता है। पञ्चम आह्निक में 'अथ चेत् सर्वभावानां न विना तत्त्वमेककम् । समन्वयोऽस्ति तदिदं कथमैक्यं विभेदितम्' ।। ५-१ ।। इत्यादि श्लोकों द्वारा एक परमतत्त्व प्रमाता ही समस्त वेद्यवस्तुओं में 'सूत्रे मणिगणा इव' अनुस्यूत है एवं सर्वेश्वरवाद का ही विस्तारपूर्वक वर्णन किया है।