भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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१३८) (श्री भक्तमाल प्रभु की टहल निज, करनि करत आप, भक्ति कौ प्रताप जानें, भागवत गाई है। देत हुते चौका कोऊ, शिष्य बहु भेंट ल्यायौ, दूर ही ते देखि, दास आयौ सो जनाई है। धोवौ हाथ, बैठौ आप, सुनिकै रिसाय उठे, सेवा ही में चाय, वाकौं खीझि समझाई है। हिये हितरासि जग, आस कौं विनास कियौ, पियौ प्रेमरस, ताकी बात लै दिखाई है।।५३०।। चारण भक्तजी चरण शरण चारण भगत, हरि गायक एता हुआ।। चौमुख चौरा चण्ड, जगत् ईश्वर गुण जाने। करमानन्द अरु कोल्ह, अल्ह अक्षर परवाने।। माधौ मथुरा मध्य, साधु जीवानन्द सीवाँ। दूदा नारायणदास, नाम मांडन नत ग्रीवाँ।। चौरासी रूपक चतुर, बरनत वानी ज्यों जुवा। चरण शरण चारण भगत, हरि गायक एता हुआ।। १३६।। श्रीकरमानन्दजी करमानन्द चारण की, वानी की उचारन में, दारुन जो हियौ होय सोऊ पिघलायकै। दियौ गृह त्यागि, हरिसेवा अनुराग भरे, बटुवा सुग्रीव हाथ, छरी पधराइकै।। काहू ठौर जाय, गाड़ि वहीं पधराये वापै, ल्याये उर प्रभु भूलि आये कहाँ पाइयै। फेरि चाह भई, दई स्याम को जताय बात, लई मँगवाय देखि, मति लै भिजाइयै।।५३१।। श्रीकोल्हजी, श्रीअल्हजी कोल्ह अल्ह भाई दोऊ, कथा सुखदाई सुनौ, पहिलौ विरक्त, मद मांस नही खात है। हरि ही के रूप, गुन वानी में उचार करै, धरै भक्तिभाव हिये, ताकी यह बात है।। दूसरौ अनुज जानौ, खाय सब उन मानौ, नृप ही कौं गावै, प्रभु कभूँ गाय जात है। बड़े के अधीन रहै, सोई करै जोई कहै, ईश करि चहै, आप दीनता में मात है।।५३२।। बड़े आय कही, चलौ द्वारका निहारैं सही, मिथ्या जगभोग, यामें आयु ही बिहात है। आज्ञा के अधीन चल्यौ, आये पुर लीन भये, नये चोज मन्दिर में, सुनौ कान बात है।। कोल्ह ने सुनाये सब जे-जे नाना छन्द गाये, पाछे अल्ह दोय चार कहे सकुचात है। भर्यो ही हुंकारौ प्रभु, कही माला गरें डारौ, ल्याये पहिरावैं, कह्यौ मेरौ बड़ौ भ्रात है।।५३३।।