श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(श्री भक्तमाल स्वरूप वर्णन १०) भगवद् प्रियता पंचरस सोई पंचरंग फूल थाके नीके, पीके पहिराइवे को रुचिकै बनाई है। वैजयन्ती दाम, भाववती अलि 'नाभा' नाम, लाई अभिराम स्याम मति ललचाई है।। धारी उर प्यारी किहूँ करत न न्यारी, अहो ! देखौ गति न्यारी ढरि पायन कौं आई है। भक्ति छबि भार ताते नमित श्रृंगार होत, होत वश लखै जोई याते जानि पाई है।।५।। सत्संग प्रभाव वर्णन भक्तितरु पौधा ताहि विघ्न डर छेरी हू, कौ, वारि दै विचार वारि सींच्यो सत्संग सौं। लाग्योई बढ़न गोदा चहुँदिसि कढ़न सो, चढ़न आकाश यश फैल्यो बहुरंग सौं।। सन्त उर आलवाल सोभित विसाल छाया, जियें जीव जाल ताप गये यों प्रसंग सौं। देखौ बढ़वारि जाहि अजाहू की शंका हुती ताहि पेड़ बाँधे झूमैं हाथी जीते जंग सौ ।। ६ ।। श्रीनाभाजी का वर्णन जाको जो स्वरूप सो अनूप लै दिखाय दियो, कियो यों कवित्त पट मिहीं मध्य लाल है। गुण पै अपार साधु कहैं आँक चारि ही में अर्थ विस्तार कविराज टकसाल है।। सुनि सन्त सभा झूमि रही अलि श्रेणी मानो घूमि रही कहैं यह कहा धौं रसाल है। सुने हे "अगर" अब जाने मैं अगर सही चोवा भये नाभा सो सुगन्ध भक्तमाल है।।७।। श्रीभक्तमाल स्वरूप वर्णन बड़े भक्तिमान निसिदिन गुनगान करें, हरैं जग पाप जाप हियो परिपूर है। जानि सुखमानि हरि सन्त सनमान सचे, बचेऊ जगत रीति प्रीति जानी मूर है।। तऊ दुराराध्य कोऊ कैसे कै अराधि सकै समझो न जात, मन कम्प भयो चूर है। शोभित तिलक भाल, माल उर राजै ऐपै, बिना भक्तमाल भक्तिरूप अति दूर है।। ८।।