श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२) (श्री भक्तमाल ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ श्रीनाभाजी की आदि अवस्था का वर्णन हनुमान वंश ही में जनम प्रसिद्ध जाकों भयो, दृगहीन सो नवीन बात धारिये। उमरि बरष पाँच मानिकै अकाल आँच, माता वन छोड़ि गई विपत्ति विचारिये।। 'कील्ह' औ 'अगर' ताहि डगर दरस दियौ, लियो यों अनाथ जानि पूछी सो उचारिये। बड़े सिद्ध जल लै कमण्डलु सौं सींचे नैन, चैन भयो खुले चख जोरी को निहारिये।। १२ ।। पाँय परि आँसू आये कृपा करि संग लाये, कील्ह आज्ञा पाइ मन्त्र अगर सुनायो है। गलते प्रकट साधुसेवा सो विराजमान, जानि उनमानि ताही टहल लगायो है।। चरन प्रछाल सन्त-सीथ सौं अनन्त प्रीति, जानी रसरीति ताते हृदय रँग छायो है। भई बढ़वारि ताकौ पावै कौन पारावार, जैसो भक्तिरूप सो अनूप गिरा गायो है।। १३ ।। ।। छप्पय ।। चौबीस अवतार चौबीस रूप लीला रुचिर श्रीअग्रदास उर पद धरौ।। जय जय मीन बराह कमठ नरहरि बलि बावन। परशुराम रघुवीर कृष्ण कीरति जगपावन।। बुद्ध कल्कि अरु व्यास पृथु हरि हंस मन्वन्तर। यज्ञ रिषभ हयग्रीव ध्रुववरदैन धनवन्तर।। बद्रीपति दत्त कपिलदेव सनकादिक करुणा करौ। चौबीस रूप लीला रुचिर श्रीअग्रदास उर पद धरौ ।। ५ ।। जिते अवतार सुखसागर न पारावार करें विस्तार लीला जीवन उधार कौं। जाही रूप माँझ मन लागै जाको पागै तहीं, जागै हिय भाव वही पावै कौन पार कौं।। सबही हैं नित्त ध्यान करत प्रकाशैं चित्त, जैसे रंक पावै वित्त जोपै जानै सार कौं। केशनि कुटिलताई ऐसे मीन सुखदाई, अगर सुरीति भाई बसौ उर हार कौं ।। १४ ।। श्रीचरण-चिह्न चरण-चिह्न रघुवीर के सन्तनि सदा सहायका।। अंकुश, अम्बर, कुलिश, कमल, जव, धुजा, धेनुपद। शंख, चक्र, स्वस्तीक, जम्बुफल, कलश, सुधाह्रद।।