भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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१४) (श्री भक्तमाल

अन्तरंग अनुचर हरि जू के जो इनकौ यश गावैं। आदि अन्त लौं मंगल तिनके श्रोता वक्ता पावैं।। अजामेल परसंग यह निर्णय परमधर्म के जान। इनकी कृपा और पुनि समझैं द्वादश भक्त प्रधान ।। ७ ।। श्रीशंकरजी द्वादश प्रसिद्ध भक्तराज कथा भागवत, अति सुखदाई नानाविधि करि गाये है। शिवजी की बात एक बहुधा न जानै कोऊ, सुनि रस सानै हियो भाव उरझाये है।। सीता के वियोग राम विकल विपिन देखि, शंकर निपुन सती वचन सुनाये है। कैसे ये प्रवीन ईश कौतुक नवीन देखौ, मनेहूँ करत अंग वैसे ही बनाये हैं।।२०।। सीता ही सो रूप वेश लेश हू न फेर फार, रामजी निहारि नेकु मन में न आई है। तब फिरि आयकै सुनाय दई शंकर को, अति दुख पाय बहुविधि समुझाई है।। इष्ट को स्वरूप धर्यो ताते तनु परिहर्यो, पर्यो बड़ो सोच मति अति भरमाई है। ऐसे प्रभु भाव पगे पोथिन में जगमगे, लगे मोको प्यारे यह बात रीझि गाई है।।२१।। चले जात मग उभै खरे शिव दीठि परे, करे परनाम हिये भक्ति लागी प्यारी है। पार्वती पूछें 'किये कौन को? जू ! कहौ मोसों दीखत न जन कोऊ' तब सो उचारी है।। बरष हजार दस बीते तहाँ भक्त भयो, नयो और ह्वैहैं दूजी ठौर बीते धारी है। सुनिकै प्रभाव हरिदासनि सौं भाव बढ़्यो, चढ़्यो कैसे जात चढ़्यो रँग अति भारी है।।२२।। अजामिलजी धर्यौ पितु मातु नाम अजामेल साँचो भयो, भयो अजामेल तिया छूटी शुभ जात की। कियो मदपान सो सयान गहि दूरि डार्यो, गार्यो तनु वाहीं सौं जो कीन्हौं लैके पातकी।। करि परिहास काहू दुष्ट ने पठाये साधु, आये घर देखि बुद्धि आई गई सातकी। सेवा करि सावधान सन्तन रिझाय लियो, नारायन नाम धरो गर्भ बाल बातकी ।। २३ ।। आइ गयो काल मोहजाल में लपटि रह्यो, महा विकराल यमदूत सो दिखाइये। वही सुत नारायन नाम जो कृपा कै दियो, लियो सो पुकारि सुर आरत सुनाइये।। सुनत ही पार्षद आये ताही ठौर दौर, तोरि डारे पाश कह्यो धर्म समुझाइये। हारे लै बिडारे जाइ पति पै पुकारे कही, 'सुनो वजमारे ! मति जावो हरि गाइये' ।। २४ ।। मास परायण प्रथम विश्राम

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