श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभयो ब्रह्मभोज कोई ऐसोई संयोग बन्यो, आये वै कुमार जहाँ विप्रन को सुर है। बोलि उठे सबै, ‘तेरी सुता कौ जु पति यहै’, हुवो चाहै जानी सुनि गयो लाज घुर है।।५८।। पऱ्यौ सोच भारी कहा करौं? यों विचारी अहो! सुता जो हमारी ताको पति ऐसो चाहिये। डारौं याहि मार याको यहै है विचार तब, बोलि नीचजन कह्यौ मारौ हिय दाहियै।। लैकै गये दूर देखि बाल छबि पूर, हम योनि परै धूर दुख ऐसो अवगाहियै। बोले अकुलाय तोहि मारेंगे सहाय कौन? माँगौ एक बात जब कहौं तब बाहियै।।५६।। मानि लीन्हौं बोल वे कपोल मध्य गोल एक, गण्डकी को सुत काढि; सेवा नीकी कीनी है। भयो तदाकार यों निहार सुख भार भरि, नैननि की कोर ही सौं आज्ञा बध दीनी है।। गिरे मुरझाइ दया आइ कछु भाय भरे, ढरे प्रभु ओर मति आनन्द सौं भीनी है। हुती छठी आँगुरी सो कटि लई दूषन हो, भूषन ही भयो जाइ कही साँचु चीन्ही है।।६०।। वहै देश भूमि में रहत लघु भूप और, और सुख सबै एक सुत चाह भारी है। निकस्यौ विपिन आनि देखि याहि मोद मानि, कीन्हीं खग छाँह घिरी मृगी पाँति सारी है।। दौरिकै निशंक लियो पाइ निधि रंक जियों, कियो मनभायो सो बँधायो श्री हु वारी है। कोऊ दिन बीते नृप भये चित चीते दियो, राज को तिलक भावभक्ति विसतारी है।।६१।। रहै जाके देश सो नरेस कछु पावै नाहीं, बाँह बल जोरि दियो सचिव पठाइकै। आयो घर जानि कियो अति सनमान सो, पिछान लियो वह बाल मारो छल छाइकै।। दई लिखि चीठी जाओ मेरे सुत हाथ दीजै, कीजै वही बात जाको आयो लै लिखाइकै। गये पुर पास बाग सेवा मति पागि करि, भरी दृग नींद नेकु सोयो सुख पाइकै।।६२।। खेलति सहेलिन सों आई वाहि बाग माँझ, करि अनुराग भई न्यारी देखि रीझी है। पाग मधि पाती छबिमाती झुकि खैचि लई, बाँचि खोलि लिख्यो विष देन पिता खीझी है।। विषया सुनाम अभिराम दृग अंंजन सौं, विषया बनाइ मनभाई रस भीजी है। आइ मिली आलिन में लालन को ध्यान हिये, पिये मद मानो गृह आइ तब धीजी है।।६३।। उठयो चन्द्रहास जिहि पास लिख्यो लायो आयो, देखि मनभायो गाढ़े गरे सौं लगायो है। दई कर पाती बात लिखी मो सुहाती बोलि, विप्र घरी एक माँझ ब्याह उघरायो है।। करी ऐसी रीति डारे बड़े नृप जीति, श्री देत गई बीति चाव पार पै न पायो है। आयो पिता नीच सुनि घूमि आई मीच मानो, वानौ लखि दूलह को शूल सरसायो है।।६४।। बैठ्यो लै इकान्त, ‘सुत! करी कहा भ्रान्त यह?’ कह्यो सो नितान्त कर पाती लै दिखाई है। बाँचि आँच लागी ‘मैं तो बड़ोई अभागी’! ऐपै मारौं मति पागी बेटी राँड हू सुहाई है।।