भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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२६) (श्री भक्तमाल इन्द्र औ अगिन गये शिवि पै परीच्छा लेन, काटि दियो गास रीझि साँचो जान्यो पन है। भरत दधीचि आदि भागवत बीच गाये, सबनि सुहाये जिन दियो तन धन है।। ८६।। श्रीविन्ध्यावलीजी विन्ध्याबली तिया-सी न देखी कहूँ तिया नैन, बाँध्यो प्रभु पिया देखि कियो मन चौगुनौ। करि अभिमान दान देन बैठ्यो तुम्हीं को, कियो अपमान मैं तो मान्यौँ सुख सौगुनौ।। त्रिभुवन छीनि लिये दिये बैरी देवतान, प्रान मात्र रहे हरि आन्यो नहीं औगुनौ। ऐसी भक्ति होय जोपै जागो रहो सोइ अहो ! रहो भव माँझ ऐपै लागै नहीं भौगुनौ।। ८७।। श्रीमोध्वजजी, श्रीताम्रध्वजजी अर्जुन के गर्व भयो कृष्ण प्रभु जानि लियो, दियो रस भरी याहि रोग यों मिटाइयै। मेरो एक भक्त आहि ताकौ लै दिखाऊँ ताहि, भये विप्र वृद्ध संग बाल चलि जाइयै।। पहुँचत भाष्यो जाइ मोरध्वज राजा कहाँ, वेगि सुधि देवो काहू बात जा जनाइयै। सेवा प्रभु करौं नेकु रहौ पाउँ धरौ जाइ, कहौ तुम बैठौ कही आग-सी लगाइयै।। ८८।। चले अनखाय पाँय गहि अटकाय जाय, नृप को सुनाय ततकाल दौरे आये हैं। बड़ी कृपा करी आज फरी चाहबेलि मेरी, निपट नबेल फल पायो याते पाये है।। दीजै आज्ञा मोहिं सोई कीजै सुख लीजै वही, पीजै वानी रस मेरे नैन लै सिराये हैं। सुनि क्रोध गयो मोद भयो सौ परीच्छा हिये, लिये चित चाव ऐसे वचन सुनाये है।। ८६।। ‘देवे की प्रतिज्ञा करो’ ‘करी जू प्रतिज्ञा हमं, जाहि भाँति सुख तुम्हें सोई मोको भाई है’। ‘मिल्यो मग सिंह यहि बालक को खाये जात, कही खावो मोहिं नहीं यही सुखदाई है’। ‘काहू भाँति छोड़ो’ नृप आधो जो सरीर आवै तौहि याहि तजौं कहि बात मो जनाई है। बोलि उठी तिया ‘अरधंगी मोहिं जाइ देवो’ पुत्र कहै ‘मोको लेवो और सुधि आई है’।। ६०।। सुनो एक बात ‘सुत तिया लै करौंत गात चीरैं धीरेँ भीरैं नाहिं’ पीछे उन भाखिये। कीन्ह्यो वाही भाँति अहो नासा लगि आयौ जब, ढर्यो दृग नीर भीर वाकर न चाखिये।। चले अनखाय गहि पाँय सो सुनाये बैन, नैन जल बाँयो अंग काम किहिं नाखिये। सुनि भरि आयो हियो निज तनु श्याम कियो, दियो सुखरूप व्यथा गई अभिलाषिये।। ६१।। मोपै तो दियो न जाइ निपट रिझाय लियो, तऊ रीझि दिये बिना मेरे हिये साल है। माँगौ वर कोटि चोट बदलो न चूकत है, सूकत है मुख सुधि आये वही हाल है।। बोल्यो भक्तराज तुम बड़े महाराज कोऊ, थोरोऊ करत काज मानौँ कृत जाल है। एक मोको दीजै दान दीयो जू बखानौ वेगि, साधु पै परीच्छा जनि करो कलिकाल है।।८२।।