भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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२८) (श्री भक्तमाल निमि अरु नव योगेश्वरा पादत्राण की हौं शरण।। कवि हरि करभाजन, भक्ति रतनाकर भारी। अन्तरिक्ष अरु चमस, अनन्यता पधति उधारी।। प्रबुध प्रेम की राशि, भूरिदा आबिर होता। पिप्पल द्रुमिल प्रसिद्ध, भवाब्धि पार के पोता।। जयन्ती नन्दन जगत के, त्रिविध ताप आमय हरण। निमि अरु नव योगेश्वरा पादत्राण की हौं शरण।। १३।। पद पराग करुणा करौ जे, नियन्ता नवधा भगति के।। श्रवण परीक्षित सुमति, व्यास सावक सुकीरतन। सुठि सुमिरन प्रहलाद पृथु पूजा कमला चरनन मन।। वन्दन सुफलकसुवन, दास्य दीपत्ति कपीश्वर। सख्यत्वे पारत्थ, समर्पण आतम बलिधर।। उपजीवी इन नाम के, एते त्राता अगति के। पद पराग करुणा करो, जे नियन्ता नवधा भगति के।। १४।। श्रीपरीक्षितजी श्रवण रसिक कहूँ सुने न परीक्षित से, पानहू करत लागी कोटिगुनी प्यास है। मुनि मन माँझ क्योहूँ आवत न ध्यावत हूँ, वहीं गर्भमध्य देखि आयो रूपरास है।। कही शुकदेव जू सौं टेव मेरी लीजै जानि, प्रान लागे कथा नहीं तक्षक को त्रास है। कीजिये परीच्छ उर आनी मतिसानी अहो ! वानी बिरमानी जहाँ जीवन निरास है।। ६५।। परमहंस श्रीशुकदेवजी गर्भ ते निकसि चले वन ही में कियो वास, व्यास से पिता को नहिं उत्तरहु दियो है। दशम श्लोक सुनि गुनि मति हरि गई, लई नई रीति पढ़ि भागवत लियो है। रूप गुन भरि सह्यो जात कैसे करि आये, सभा नृप ढरि भीज्यो प्रेमरस हियो है। पूछे भक्तभूप ठौर-ठौर परे भौंर जाय, गाय उठे जबैं मानो रँग झर कियो है।। ६८।।