श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीजयदेवजी) (४७ बोले मुसुकाइ विप्र क्षिप्र सो दिखाइ दई, नई यह कोऊ मति अति भरमाइयै। धरी दोऊ मन्दिर में जगन्नाथदेव जू के, दीनी यह डारि वह हार लपटाइयै ।। १४८ ।। पर्यो सोच भारी नृप निपट खिसानो भयो, गयो उठि सागर में बूड़ौ वही बात है। अति अपमान कियो, कियो मैं बखान सोई, गोई जात कैसे? आँच लागी गात-गात है।। आज्ञा प्रभु दई 'मत बूड़ै तू समुद्र माँझ, दूसरो न ग्रन्थ ऐसो वृथा तनु पात है। द्वादस सुश्लोक लिखि दीजे सर्ग द्वादस में, ताहि संग चलै जाकी ख्याति पात-पात है' ।। १४६ ।। सुता एक माली की जु बैंगन की वारी माँझ, तौरै वनमाली गावै कथा सर्ग पाँच की। डौलैं जगन्नाथ पाछें-काछें अँग मिहीं झँगा, आछे कहि घूमैं सुधि आवै बिरहाँच की।। फट्यौ पट देखि नृप पूछी 'अहो! भयो कहा?' 'जानत न हम' 'अब कहो बात साँच की'। प्रभु ही जनाई 'मनभाई मेरे वही गाथा', ल्याये वही बालकी कौं पालकी मैं नाँच की।। १५० ।। फेरी नृप डाँडी यह औंड़ी बात जानि महा, कहा राजा रंक पढ़ै नीकी ठौर जानिकैं। अक्षर मधुर और मधुर स्वरनि ही सौं, गावैं जब लाल प्यारी ढिंगहि लैं मानिकैं।। सुनी यह रीति एक मुगल ने धारि लई, पढ़ै-चढ़ै घोड़े आगे श्याम रूप ठानिकैं। पोथी को प्रताप स्वर्ग गावत हैं देवबधू आप ही जु रीझि लिख्यो निज कर आनिकैं ।। १५१ ।। पोथी की तो बात सब कही मैं सुहात हिये, सुनौ और बात जामें अति अधिकाइये। गाँठि में मुहर मग चलत में ठग मिले 'कहो कहाँ जात?' 'जहाँ तुम चलि जाइये'। जानि लई बात खोलि द्रव्य पकराइ दियो, लियो चाहो जोई-जोई सोई मोकौं ल्याइये। दुष्टनि समुझि कही कीनी इन विद्या अहो! आवै जो नगर इन्हें वेगि पकराइये।। १५२।। एक कहै 'डारौ मार भलो है विचार यही', एक कहै 'मारौ मत धन हाथ आयो है'। 'जोपै ले पिछान कहूँ कीजिये निदान कहा', हाथ-पाँव काटि बड़े गाढ़ पधरायो है।। आयो तहाँ राजा एक देखिकै विवेक भयो, छायो उजियारो औ प्रसन्न दरसायो है। बाहर निकालि मानो चन्द्रमा प्रकास राशि, पूछ्यो इतिहास कह्यो 'ऐसो तनु पायो है' ।। १५३ ।। बड़ेई प्रभाववान सकै को बखान? अहो! मेरे कोऊ भूरि भाग दरसन कीजिये। पालकी बिठाइ लिये किये सब ठूठ नीके, जी के भाये भये 'कछु आज्ञा मोहि दीजिये'। 'करौ हरि साधु-सेवा नाना पकवान मेवा, आवैं जोई सन्त तिन्हें देखि-देखि भीजिये'। आये वेई ठग माला तिलक चिलक किये, किलकि के कही 'बड़े बन्धु लखि लीजिये' ।। १५४ ।। नृपति बुलाइ कही हिये हरि भाय भरि, 'ढरे तेरे भाग अब सेवा फल लीजिये'। गयो लै महल माँझ टहल लगाये लोग, लागे होन भोग जिय शंका तन छीजिये ।।