भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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६८) (श्री भक्तमाल देखि तन त्याग पति, भई और गति याकी, ऐसो रतिवान् मैं न भेद कछू पायो है। भयो दुख भारी, सुधि-बुधि सब तब टारी, नेकु न विचारी, भावरासि हियो छायो है।। निसिदिन ध्यान तजे, विरह प्रबल प्रान, भक्ति रस खान, रूप कापै जात गायो है। जाके यह होय, सोई जानै रस भोय सब, डारै मति खोय, यामें प्रगट दिखायो है।। २५७ ।। श्री गुरुनिष्ठ भक्त गुरु गदित वचन शिष सत्य अति, दृढ़ प्रतीति गाढ़ो गह्यो ।। अनुचर आज्ञा माँगि, कह्यो कारज कौं जैहों। आचारज इक बात, तोहिं आये तें कहिहौं ।। स्वामी रह्यो समाय, दास दरसन कौं आयो। गुरु की गिरा विश्वास, फेरि शव घर में ल्यायो ।। शिषपन साँचो करन कौं, विभु सबै सुनत सोई कह्यो। गुरु गदित वचन शिष सत्य अति, दृढ़ प्रतीति गाढ़ो गह्यो ।। ५८ ।। बड़ो गुरुनिष्ठ, कछु घटी साधु, इष्ट जानै, स्वामी, सन्त पूज्य मानैं कैसैं समझाइयै। नित्यहिं विचारे, पुनि टारे, पै उचारे नाहिं, चल्यो जब रामत कौं, कही फिरि आइयै ।। सपथ दिवाई न जराइवे कौं दियो तन, ल्यायो यों फिराइ वही बात जू जनाइयै। साँचो भाव जानि, प्रान आये सो बखान कियो, करो भक्त सेवा, करी वर्ष लौं दिखाइये ।। २५८ ।। श्रीरैदासजी सन्देह ग्रन्थि खण्डन निपुन, वानी विमल रैदास की ।। सदाचार श्रुति शास्त्र, वचन अविरुद्ध उचार्यौ। नीर खीर विवरण, परम हंसनि उर धार्यौ ।। भगवत् कृपा प्रसाद, परमगति इहि तन पाई। राजसिंहासन बैठि, ज्ञाति परतीति दिखाई ।। वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज वन्दहिं जासु की। सन्देह ग्रन्थि खण्डन निपुन, वानी विमल रैदास की ।। ५६ ।।