भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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७०) (श्री भक्तमाल बसत चित्तौर माँझ रानी एक झाली नाम, नाम बिन कान खाली आनि शिष्य भई है। संगहु तैं विप्र सुनि छिप्र तन आँच लागी, भागी मति नृप आगे भीर सब गई है।। वैसेहिं सिंहासन पै आयकै विराजे प्रभु, पढ़े वेद वानी पै न आये यह नई है। पतितपावन नाम कीजिये प्रगट आजु, गायो पद गोद आय बैठे भक्ति लई है।। २६६।। गई घर झाली पुनि बोलिकै पठाये 'अहो! जैसे प्रतिपाली अब तैसें प्रतिपारिये'। आपुहू पधारे उन बहु धन पट वारे विप्र सुनि पाँव धारे सीधौ दै निवारिये।। करिकै रसोई द्विज भोजन करन बैठे द्वै-द्वै मधि एक यों रैदास कौं निहारिये। देखि भई आँखै दीन भाषैं शिष्य भये लाखैं स्वर्ण को जनेऊ काढ़्यो त्वचा कीनी न्यारिये।।२६७।। श्रीकबीरजी कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रम षट्दरसनी।। भक्ति विमुख जो धर्म सो अधरम करि गायो। जोग जग्य व्रत दान भजन बिनु तुच्छ दिखायो।। हिन्दू तुरक प्रमान रमैनी शबदी साखी। पक्षपात नहिं वचन सबही के हित की भाखी।। आरूढ़ दसा ह्वै जगत् पर मुखदेखी नाहिन भनी। कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रम षट्दरसनी।। ६०।। अति ही गम्भीर मति सरस कबीर हियो, लियो भक्तिभाव जाति-पाँति सब टारियै। भई नभ वानी देह तिलक रमानी करौ, करौ गुरु रामानन्द गरैं माल धारियै।। देखें नहिं मुख मेरो मानिकैं मलेछ मोकौं जात न्हान गंगा कही मग तन डारियै। रजनी के शेष में आवेस सौं चलत आप परै पग राम कहै मन्त्र सो विचारिये।। २६८।। कीनी वही बात माला-तिलक बनाय गात मानि उतपात मात शोर कियो भारियै। पहुँची पुकार रामानन्द जू कैं पास आनि कही कोऊ पूछे तुम नाम लै उचारिये। ल्यावौ जू पकरि वाको कब हम शिष्य कियो? ल्याये करि परदा में पूछी कहि डारिये। राम-नाम मन्त्र यही लिख्यो सब तन्त्रनि में खोलि पट मिले साँचौ मत उर धारियै।। २६६।। बुनैनं तानों-बानों हिये राम मँडरानौं कहि कैसे कै बखानौं वह रीति कछु न्यारिये। उतरनोई करैं जामें तन निरवाह होय भोय गई औरै बात भक्ति लागी प्यारियै।।