श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२) (श्री भक्तमाल ल्यावौ रे ! पकरि वाको देखौं ये मकर कैसो, अकर मिटाऊँ गाढ़े जकर तनाव है। आनि ठाढ़े किये काजी कहत 'सलाम करौ', जानै न सलाम जानै राम गाढ़े पाँव है।। २७७ ।। बाँधिकै जंजीर गंगा नीर माँझ वोरि दिये, जिये तीर ठाढ़े कहै 'जन्त्र-मन्त्र आवंही'। लकरीन माँझ डारि अगिनि प्रजारि दई, नई मानो भई देह कंचन लजावही।। विफल उपाय भये तऊ नहीं आय नये, तब मतवारो हाथी आनिकै झुकावही। आवत न ढिंग औ चिघारि हारि भाजि जाय, आप आगे सिंह रूप बैठे सो भगावहीँ।। २७८ ।। देख्यो बादसाह भाव कूदि परे गहे पाँव, देखि करामात मात भये सब लोग हैं। 'प्रभु पै बचाय लीजै हमें न गजब कीजै, दीजै जोई चाहो गाँव देश नाना भोग हैं'। 'चाहैं एक राम जाकौं जपैं आठो याम और, दाम सौं न काम जामें भरे कोटि रोग हैं'। आये घर जीति साधु मिले करि प्रीति जिन्हें, हरि की प्रतीति वेई गायवे के जोग है।। २७९ ।। होय के खिसाने द्विज निज चारि विप्रन के, मूँडनि मुड़ायो भेष सुन्दर बनाये है। दूर-दूर गाँवनि में नावनि को पूँछि-पूँछि, नाम लै कबीर जू कौ झूठैं न्योति आये है। आये सब साधु सुनि एतो दुरि गये कहूँ, चहुँ दिसि सन्तनि के फिरैं हरि धाये हैं। उनहीं को रूप धरि न्यारी-न्यारी ठौर बैठे, एकु मिलि गये नीके पोषिकै रिझाये हैं।। २८० ।। आई अपछरा छारिवे के लिये भेष किये, हिये देखि गाढ़ो फिरि गई नहीं लागी है। चतुर्भुजरूप प्रभु आनिकैं प्रगट कियो, लियो फल नैननि कौ बड़ौ बड़भागी है।। सीस धरै हाथ तन साथ मेरे धाम आवौ, गावौ गुन रहौ जौलौं तेरी मति पागी हैं। मगह में जाय भक्तिभाव को दिखाय बहु, फूलनि मँगाय पौढ़ि मिल्यौ हरि रागी है।। २८१।। मास परायण बाहरवाँ विश्राम श्रीपीपाजी की कथा पीपा प्रताप जग वासना, नाहर कौं उपदेश दियौ ।। प्रथम भवानी भक्त, मुक्ति माँगन कौं धायौ। सत्य कह्यो तिहिं शक्ति, सुदृढ़ हरिशरण बतायौ ।। श्रीरामानन्द पद पाइ, भयौ अति भक्ति की सीवाँ । गुण असंख्य निर्मोल, सन्त धरि राखत ग्रीवाँ ।। परसि प्रणाली सरस भई, सकल विश्व मंगल कियौ । पीपा प्रताप जग वासना नाहर कौं उपदेश दियौ ।। ६१ ।।