भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

७४) (श्री भक्तमाल चले पहुँचायवे को प्रीति के अधीन आप, बिन जल मीन जैसे ऐसे फिरि आये है। देखि नई बात गात सूखे पट भीजे हिये, लिये पहिचानि आनि पग लपटाये है।। दई लैके छाप पाप जगत् के दूरि करौ, 'ढरौ कहूँ और' कहि सीता समझाये हैं। छूटेई मिलान वन में पठान भेंट भई, लई छिनि तिया कियौ चैन प्रभु धाये हैं।। २८६।। अभूँ लगि जाओ घर कैसे-कैसे आवै डर, बोली 'हरि ! जानियै न भाव पै न आयो है'। लेत हौं परीक्ष्छा मैं तो जानौं तेरी सिच्छा ऐपै, सुनि दृढ़ बात कान अति सुख पायो है।। चले मग दूसरे सु तामें एक सिंह रहै, आयौ बास लेत शिष्य कियो समझायो है। आये और गाँव शेषसाई प्रभु नांव रहै, करे बाँस हरे ढरे चीधर सुहायो है।। २९०।। दोऊ तिया पति देखें आये भागवत ऐपै, घर की कुगति रति साँची लै दिखाई है। लहँगा उतारि बेचि दियौ ताकौ सीधौ लियौ, 'करौ अजू! पाक' बधू कोठी में दुराई है।। करी लै रसोई सोई भोग लगि बैठे कह्यौ आवौ मिलि दोई कही पाछे सीथ भाई है। वाहू कौ बुलावौ ल्यावौ आनिकै जिमावौ, तब सीता गई ठौर जाइ नगन लखाई है।। २६१।। पूछैं 'कहो बात ये उघारे क्यों है गात', कही 'ऐसे ही बिहात साधुसेवा मन भाई है'। 'आवैं जब सन्त सुख होत है अनन्त तन, ढक्यौं कै उघारौ ? कहा चरचा चलाई है'। जानि गई रीति प्रीति देखी एक इनहीं में 'हमहूँ कहावैं ऐपै छटाहूँ न पाई है'। दियौ पट आधौ फारि गहि कै निकारि लई, भई सुख सैल पाछैं पीपा सौं सुनाई है।। २६२।। 'करैं वेश्याकर्म अब धर्म है हमारौ यही', कही जाय बैठी जहाँ नाजनि की ढेरी है। घिरि आये लोग जिन्हें नैननि कौ रोग, लखि दूर भयो शोक नेकु नीके हूँ न हेरी है।। कहैं तुम कौन ? 'बारमुखी नहीं भौना संग भरुवा सु गहैं मौन सुनि परी बेरी है। करी अन्नरासि आगे मुहर रुपैया पागे, पठै दई चीधर के तबही निबेरी है।। २६३।। आज्ञा माँँगि तोड़े आये कभूूँ भूखे कभूूँ घाये, औचक ही दाम पाये गयो हो स्नान को। मुहरनि भाँड़ो भूमि गाड़ो देखि छाँडि आयौं, कही निसि तिया बोली 'जावौ सर आन को'।। चोर चाहैं चोरी करैं ढरे सुनि वाही ओर, देखें जो उघारि साँप डारैं हतै प्रान को। ऐसे आय परीं गनी सात सत बीस भईं, तौ लै पाँच बाँट करै एक के प्रमान को।। २६४।। जोई आवै द्वार ताहि देत हैं अहार और, बोलिकै अनन्त सन्त भोजन करायो है। बीत दिन तीन धन खवाय प्याय छीन कियौ, लियो सुनि नाम नृप देखिवे को आयो है।। देखिकै प्रसन्न भयौ नयौ 'देवौ दीच्छा मोहि', दीच्छा है अतीत करैं आप सो सुहायो है। 'चाहो सोई करौं ह्वै कृपाल मोकौं ढरौ', 'अजू! आनि सम्पति औ रानी जाइ ल्यायो है'।।२६५।।