श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६) (श्री भक्तमाल विषई कुटिल चारि साधुभेष लियौ धारि, कीनी मनोहारि कही 'तिया निज दीजिये'। करिकै सिंगार सीता कोठे माँझ बैठीं जाय, चाहें मग आतुर ह्वै अजू! जाहु लीजिये॥ गये जब द्वार उठी नाहरी सुपारिवे कौं, फारैं नहीं वानौ जानि आय अति खीजियै। अपनौ विचारो हियो कियो भोग भावना कौ, मानि साँच भये शिष्य प्रभु मति धीजिये॥३०३॥ (१) गूजरी कौं धन दियौ (२) पियौ दही सन्तनि नैं, (३) ब्राह्मन को भक्त कियौ (४) देवी दी निकारिकै। (५) तेली कौं जिवायौ (६) भैंसि चोरनि पै फेरि ल्यायौ (७) गाड़ी भरि गेहूँ (८) तन पाँच ठौर जारिकै।। (६) कागद लै कोरो कर्यौ (१०) बनियाँ को शोक हर्यौ, (११) भर्यो घर त्यागि (१२) डारी हत्या हूँ उतारिकै। (१३) राजा कौं औसेर भई (१४) सन्त कौं जु विभौ दई, (१५) लई चीठी मानि गये श्रीरंग उदारिकै॥३०४॥ सप्ताह परायण तीसरा विश्राम (१) श्रीरंग के चेत धर्यौ (२) तिया हिय भाव भर्यौ, (३) ब्राह्मन को शोक हर्यो राजा पै पुजायकै। (४) चँदवा बुझाय लियौ (५) तेली को लै बैल दियौ, (६) दियौ पुनि घर माँझ भयौ सुख आयकै।। (७) बड़ोई अकाल पर्यौ जीव दुख दूर कर्यौ, पर्यौ भूमि गर्भ धन पायौ दै लुटायकै। (८) अति विस्तार लियौ कियौ है विचार, (६) यह सुनै एक बार फेरि भूलै नहीं गायकै॥३०४॥ मास परायण तेहरंवा विश्राम श्रीधनाजी धन्य धना के भजन को, बिनहीं बीज अंकुर भयौ॥ घर आये हरिदास, तिनहिं गोधूम खवाये। तात मात डर खेत, थोथ लांगूल चलाये॥ आस-पास कृषिकार, खेत की करत बड़ाई। भक्त भजे की रीति, प्रगट परतीति जु पाई॥ अचरज मानत जगत में, कहुँ निपुज्यौ कहुँवौ बयौ। धन्य धना के भजन को, बिनहिं बीज अंकुर भयौ॥ ६२॥ खेत की तौ बात कही प्रगट कवित्त माँझ, और एक सुनौ भई प्रथम जु रीति है। आयौ साधु विप्र धाम सेवा अभिराम करै, ठर्यौ ढिंग आय कही 'मोहूँ दीजैं प्रीति है'॥ पाथर लै दियौ अति सावधान कियौ छाती, माँझ लाय जियौ सेवै जैसी नेह नीति है। रोटी धरि आगे आँखि मूँदि लियौ परदा कै, छियौ नहीं टूक देखि भई बड़ी भीति है॥३०६॥