भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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श्रीमाधवदासजी) (८१ माधौदास द्विज निज तिया तन त्याग कियौ, लियौ इन जानि जग ऐसोई व्योहार है। सुत की बढ़नि जोग लियें नित चाहत हो, भई यह औरैं लै दिखाई करतार है।। ताते तजि दियौ गेह वेई अब पालैं देह, करै अभिमान सोई जानिये गँवार है। आये नीलगिरि धाम रहे गिरिसिन्धु तीर, अति मतिधीर भूख-प्यास न विचार है।। ३१५।। भये दिन तीन एतो भूख के अधीन, नाहिं रहें हरि लीन प्रभु सोच पर्यो भारियै। दियौ सैनभोग आप लक्ष्मी जू लै पधारीं, हाटक की थारी झनझन पाँव धारियै।। बैठे हैं कुटी में पीठ दिये हिये रूप रँगे, बीजुरी-सी कौंधि गई नीके न निहारियै। देखि सो प्रसाद बड़ौ मन अह्लाद भयौ, लयौ भाग मानि पात्र धर्योइ विचारियै।। ३१६।। खोलैं जो किवार थार देखियै न सोच पर्यो, कर्यो लै जतन ढूँढ़ि वाही ठौर पायौ है। ल्याये बाँधि मारी बेंत धारी जगन्नाथदेव, भेव जब जान्यौ पीठ चिह्न दरसायौ है।। कही पुनि आप मैं ही दियौ जब लियौ याने, माने अपराध पाँव गहिकै छिमायौ है। भई यों प्रसिद्ध बात कीरति न माँत कहूँ, सुनिकै लजात साधु शील यह गायौ है।। ३१७।। देखत सरूप सुधि तन की बिसरी जात, रहि जात मन्दिर में जानै नहीं कोई है। लग्यौ सीत गात सुनौ बात प्रभु काँपि उठे, दई सकलात आनि प्रीति हिये भोई है।। लागे जब बेगि-बेगि जाय परे सिन्धु तीर, चाहें जब नीर लिये ठाढ़े देहँ धोई है। करिकै विचार और निहारि कही जानी मैं तो, देत हौ अपार दुख ईशता लै खोई है।। ३१८।। 'कहा करौं अहो! मोपै रह्यो नहीं जात नेकु, मेटौ विथा गात' 'मोकौं विथा बहु भारी है'। रहै भाग शेष और तन में प्रवेस करै, ताते नहीं दूर करौं ईशता लै टारी है।। बहू बात साँच याकी गाँस एक और सुनौ, साधु को न हँसै कोऊ यह मैं विचारी है। देखत ही देखत में पीड़ा सो विलाय गई, नई-नई कथा कहि भक्ति बिसतारी है।। ३१९।। कीरति अभंग देखि भिक्षा कौ अरम्भ कियौ, दियौ काहू बाई पोता खीजत चलायकै। देवो गुन लियौ नीके जल सौं प्रछाल करि, करी दिव्य बाती दई दिये में बरायकै।। मन्दिर उँजारौ भयौ हिये को अन्ध्यारौ गयौ, गयो फेरि देखन कौं परी पाँय आयकै। ऐसे हैं दयाल दुख देत में निहाल करैं, करैं लै जे सेवा ताको सकै कौन गायकै।। ३२०।। पण्डित प्रबल दिग्गिवजै करि आयौ आय, वचन सुनायौ 'जू ! विचार मोसों कीजिये'। दई लिखि हारि काशी जायकै निहारि पत्र, भयौ अति खार लिखि जीति वाकी खीजियै।। फेरि मिलि माधौ जू कौं वैसे ही हरायौ एक, खर कौ मँगायौ कही 'चढ़ौ जब धीजियै'। बोल्यौ 'जूती बाँधो कान' गयो सुनि न्हान आन, जगन्नाथ जीते लै चढ़ायौ वाको रीझियै।। ३२१।।