भारतकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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८४) (श्री भक्तमाल श्यामताई माँझ सो ललाई हूँ समाइ जाय, ताते मेरे जान फिरि आई यहै मन में। जसुमति सुत सोई शची सुत गौर भये, नये-नये नेह चोज नाचैं निज गन में।। ३३०।। आवै कभूँ प्रेम हेमपिण्डवत तन होत, कभूँ सन्धि-सन्धि छूटि अंग बढ़ि जात है। और एक न्यारी रीति आँसू पिचकारी मानौं उभै लाल प्यारी भावसागर समात है।। ईशता बखान कही करौ सो प्रमान याको, 'जगन्नाथ क्षेत्र नेत्र निरखि साक्षात है'। चतुर्भुज षट्भुज रूप लै दिखाय दियो, दियो जो अनूप हित बात पात-पात है।। ३३१।। श्रीकृष्णचैतन्य नाम जगत प्रगट भयौ, अति अभिराम लै महन्त देही धरी है। जितो गौड़ देश भक्ति लेशहूँ न जानै कोऊ, सोऊ प्रेमसागर में बोर्यो कहि 'हरी' है।। भये सिरमौर एक-एक जग तारिवे कौं, धारिवे कौं कौन साखि पोथिन में धरी है। कोटि कोटि अजामील वारि डारै दुष्टता पै, ऐसेहूँ मनन किये भक्ति भूमि भरी है।। ३३२।। श्रीसूरदासजी सूर कवित सुनि कौन कवि, जो नहिं सिर चालन करै।। उक्ति चोज अनुप्रास, वरन अस्थिति अति भारी। वचन प्रीति निर्वाह, अर्थ अद्भुत तुक धारी।। प्रतिबिम्बित दिवि दृष्टि, हृदय हरि लीला भासी। जनम करम गुन रूप, बसै रसना परकासी।। विमल बुद्धि गुन और की, जो यह गुन श्रवननि धरै। सूर कवित सुनि कौन कवि, जो नहिं सिर चालन करै ।।७३।। श्रीपरमानन्ददासजी ब्रजबधू रीति कलियुग विषैं, परमानन्द भयौ प्रेमकेत।। पौगण्ड बाल कैशोर, गोप लीला सब गाई। अचरज कहा यह बात, हुतौ पहिलौ जु सखाई।। नैननि नीर प्रवाह, रहत रोमांच रैन दिन। गद्गद् गिरा उदार, श्याम शोभा भीज्यौ तन।।