श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1001, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरकाण्ड *
१११
हे पक्षिराज! सुनिये, अब मैं अपने प्रथम जन्मके चरित्र कहता हूँ, जिन्हें सुनकर प्रभुके चरणोंमें प्रीति उत्पन्न होती है, जिससे सब क्लेश मिट जाते हैं ॥ १६ (क) ॥
पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल।
नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल ॥ १६ (ख) ॥
हे प्रभो! पूर्वके एक कल्पमें पापोंका मूल युग कलियुग था, जिसमें पुरुष और स्त्री सभी अधर्मपरायण और वेदके विरोधी थे ॥ १६ (ख) ॥
तेहिं कलिजुग कोसलपुर जाई। जन्मत भयउँ सूद्र तनु पाई॥ सिव सेवक मन क्रम अरु बानी। आन देव निंदक अभिमानी ॥
उस कलियुगमें मैं अयोध्यापुरीमें जाकर शूद्रका शरीर पाकर जन्मा। मैं मन, वचन और कर्मसे शिवजीका सेवक और दूसरे देवताओंकी निन्दा करनेवाला अभिमानी था ॥ १ ॥
धन मद मत्त परम बाचाला। उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला ॥ जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी। तदपि न कछु महिमा तब जानी ॥
मैं धनके मदसे मतवाला, बहुत ही बकवादी और उग्रबुद्धिवाला था; मेरे हृदयमें बड़ा भारी दम्भ था। यद्यपि मैं श्रीरघुनाथजीकी राजधानीमें रहता था, तथापि मैंने उस समय उसकी महिमा कुछ भी नहीं जानी ॥ २ ॥
अब जाना मैं अवध प्रभावा। निगमागम पुरान अस गावा ॥ कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई। राम परायन सो परि होई ॥
अब मैंने अवधका प्रभाव जाना। वेद, शास्त्र और पुराणोंने ऐसा गाया है कि किसी भी जन्ममें जो कोई भी अयोध्यामें बस जाता है, वह अवश्य ही श्रीरामजीके परायण हो जायगा ॥ ३ ॥
अवध प्रभाव जान तब प्रानी। जब उर बसहिं रामु धनुपानी ॥ सो कलिकाल कठिन उरगारी। पाप परायन सब नर नारी ॥
अवधका प्रभाव जीव तभी जानता है, जब हाथमें धनुष धारण करनेवाले श्रीरामजी उसके हृदयमें निवास करते हैं। हे गरुड़जी! वह कलिकाल बड़ा कठिन था। उसमें सभी नर-नारी पाप-परायण (पापोंमें लिस) थे ॥ ४ ॥
दो०—कलिमल ग्रसे धर्म सब लुस भए सदग्रंथ।
दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ ॥ १७ (क) ॥
कलियुगके पापोंने सब धर्मोंको ग्रस लिया, सदग्रन्थ लुप्त हो गये, दम्भियोंने अपनी बुद्धिसे कल्पना कर-करके बहुत-से पंथ प्रकट कर दिये ॥ १७ (क) ॥