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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 1006, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 1006

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  • रामचरितमानस *

कवियोंके तो झुंड हो गये, पर दुनियामें उदार (कवियोंका आश्रयदाता) सुनायी नहीं पड़ता। गुणमें दोष लगानेवाले बहुत हैं, पर गुणी कोई भी नहीं है। कलियुगमें बार-बार अकाल पड़ते हैं। अत्रके बिना सब लोग दुखी होकर मरते हैं ॥ ५ ॥

दो०— सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाषंड।

मान मोह मारादि मद व्यापि रहे ब्रह्मंड ॥ १०१ ( क ) ॥

हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये, कलियुगमें कपट, हठ (दुराग्रह), दम्भ, द्वेष, पाषण्ड, मान, मोह और काम आदि (अर्थात् काम, क्रोध और लोभ) और मद ब्रह्माण्डभरमें व्याप्त हो गये (छा गये) ॥ १०१ ( क ) ॥

तामस धर्मकरहिं नर जप तप व्रत मख दान।

देव न बरषहिं धरनीं बए न जामहिं धान ॥ १०१ ( ख ) ॥

मनुष्य जप, तप, यज्ञ, व्रत और दान आदि धर्म तामसी भावसे करने लगे। देवता (इन्द्र) पृथ्वीपर जल नहीं बरसाते और बोया हुआ अन्न उगता नहीं ॥ १०१ (ख) ॥

छं०—अबला कच भूषण भूरि छुधा। धनहीन दुखी ममता बहुधा ॥

सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता। मति थोरि कठोरि न कोमलता ॥

स्त्रियोंके बाल ही भूषण हैं (उनके शरीरपर कोई आभूषण नहीं रह गया) और उनको भूख बहुत लगती है (अर्थात् वे सदा अतृप्त ही रहती हैं।) वे धनहीन और बहुत प्रकारकी ममता होनेके कारण दुखी रहती हैं। वे मूर्ख सुख चाहती हैं, पर धर्ममें उनका प्रेम नहीं है। बुद्धि थोड़ी है और कठोर है; उनमें कोमलता नहीं है ॥ १ ॥

नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान विरोध अकारनहीं ॥

लघु जीवन संबतु पंच दसा। कल्पपांत न नास गुमानु असा ॥

मनुष्य रोगोंसे पीड़ित हैं, भोग (सुख) कहीं नहीं है। बिना ही कारण अभिमान और विरोध करते हैं। दस-पाँच वर्षका थोड़ा-सा जीवन है, परन्तु घमंड ऐसा है मानो कल्पान्त (प्रलय) होनेपर भी उनका नाश नहीं होगा ॥ २ ॥

कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा ॥

नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता ॥

कलिकालने मनुष्यको बेहाल (अस्त-व्यस्त) कर डाला। कोई बहिन-बेटीका भी विचार नहीं करता। [लोगोंमें] न सन्तोष है, न विवेक है और न शीतलता है। जाति, कुजाति सभी लोग भीख माँगनेवाले हो गये ॥ ३ ॥

इरिषा परुषाच्छर लोलुपता। भरि पूरि रही समता बिगता ॥

सब लोग बियोग बिसोक हुए। बरनाश्रम धर्म अचार गए ॥