श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1009, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरकाण्ड *
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तमोगुण बहुत हो, रजोगुण थोड़ा हो, चारों ओर वैर-विरोध हो, यह कलियुगका प्रभाव है। पण्डित लोग युगोंके धर्मको मनमें जान (पहिचान) कर, अधर्म छोड़कर धर्ममें प्रीति करते हैं ॥ ३ ॥
काल धर्म नहीं व्यापहिं ताही । रघुपति चरन प्रीति अति जाही ॥ नट कृत बिकट कपट खगराया । नट सेवकहि न व्यापइ माया ॥
जिसका श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें अत्यन्त प्रेम है, उसको कालधर्म (युगधर्म) नहीं व्यापते। हे पक्षिराज! नट (बाजीगर) का किया हुआ कपट-चरित्र (इन्द्रजाल) देखनेवालोंके लिये बड़ा विकट (दुर्गम) होता है, पर नटके सेवक (जंभूरे) को उसकी माया नहीं व्यापती ॥ ४ ॥
दो०— हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं ।
भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं ॥ १०४ ( क ) ॥
श्रीहरिकी मायाके द्वारा रचे हुए दोष और गुण श्रीहरिके भजन बिना नहीं जाते। मनमें ऐसा विचारकर, सब कामनाओंको छोड़कर (निष्कामभावसे) श्रीरामजीका भजन करना चाहिये ॥ १०४ ( क ) ॥
तेहिं कलिकाल बरष बहु बसेउँ अवध बिहगेश ।
परेउ दुकाल बिपति बस तब मैं गयउँ बिदेस ॥ १०४ ( ख ) ॥
हे पक्षिराज! उस कलिकालमें मैं बहुत वर्षांतक अयोध्यामें रहा। एक बार वहाँ अकाल पड़ा, तब मैं विपत्तिका मारा विदेश चला गया ॥ १०४ ( ख ) ॥
गयउँ उजेनी सुनु उरगारी । दीन मलीन दरिद्र दुखारी ॥ गएँ काल कछु संपति पाई । तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई ॥
हे सर्पाँके शत्रु गरुड़जी! सुनिये। मैं दीन, मलिन (उदास), दरिद्र और दुखी होकर उज्जैन गया। कुछ काल बीतनेपर कुछ सम्पत्ति पाकर फिर मैं वहीँ भगवान् शंकरकी आराधना करने लगा ॥ १ ॥
बिप्र एक बैदिक सिव पूजा । करइ सदा तेहि काजु न दूजा ॥ परम साधु परमारथ बिंदक । संभु उपासक नहिं हरि निंदक ॥
एक ब्राह्मण वेदविधिसे सदा शिवजीकी पूजा करते, उन्हें दूसरा कोई काम न था। वे परम साधु और परमार्थके ज्ञाता थे, वे शम्भुके उपासक थे, पर श्रीहरिकी निन्दा करनेवाले न थे ॥ २ ॥
तेहि सेवउँ मैं कपट समेता । द्विज दयाल अति नीति निकेता ॥ बाहिज नम्र देखि मोहि साई । बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाई ॥
मैं कपटपूर्वक उनकी सेवा करता। ब्राह्मण बड़े ही दयालु और नीतिके घर थे। हे स्वामी! बाहरसे नम्र देखकर ब्राह्मण मुझे पुत्रकी भाँति मानकर पढ़ाते थे ॥ ३ ॥