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श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 1026, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 1026

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  • रामचरितमानस *

मैंने आपकी कृपासे श्रीरामचन्द्रजीके पवित्र गुणसमूहोंको सुना और शान्ति प्राप्त की। हे प्रभो! अब मैं आपसे एक बात और पूछता हूँ। हे कृपासागर! मुझे समझाकर कहिये ॥ ४ ॥

कहहिं संत मुनि वेद पुराना । नहीं कछु दुर्लभ ग्यान समाना ॥ सोड़ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं । नहीं आदरेहु भगति की नाईं ॥

संत, मुनि, वेद और पुराण यह कहते हैं कि ज्ञानके समान दुर्लभ कुछ भी नहीं है। हे गोसाईं! वही ज्ञान मुनिने आपसे कहा, परन्तु आपने भक्तिके समान उसका आदर नहीं किया ॥ ५ ॥

ग्यानहि भगतिहि अंतर केता । सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता ॥ सुनि उरगारि बचन सुख माना । सादर बोलेउ काग सुजाना ॥

हे कृपाके धाम! हे प्रभो! ज्ञान और भक्तिमें कितना अन्तर है? यह सब मुझसे कहिये। गरुड़जीके वचन सुनकर सुजान काकभुशुण्डिजीने सुख माना और आदरके साथ कहा— ॥ ६ ॥

भगतिहि ग्यानहि नहीं कछु भेदा । उभय हरहिं भव संभव खेदा ॥ नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर । सावधान सोउ सुनु बिहंगबर ॥

भक्ति और ज्ञानमें कुछ भी भेद नहीं है। दोनों ही संसारसे उत्पन्न क्लेशोंको हर लेते हैं। हे नाथ! मुनीश्वर इनमें कुछ अन्तर बतलाते हैं। हे पक्षिश्रेष्ठ! उसे सावधान होकर सुनिये ॥ ७ ॥

ग्यान बिराग जोग बिग्याना । ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना ॥ पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती । अबला अबल सहज जड़ जाती ॥

हे हरिवाहन! सुनिये; ज्ञान, वैराग्य, योग, विज्ञान—ये सब पुरुष हैं; पुरुषका प्रताप सब प्रकारसे प्रबल होता है। अबला (माया) स्वाभाविक ही निर्बल और जाति (जन्म) से ही जड़ (मूर्ख) होती है ॥ ८ ॥

दो०—पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर ।

न तु कामी विषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर ॥ ११५ ( क ) ॥

परन्तु जो वैराग्यवान् और धीरबुद्धि पुरुष हैं वही स्त्रीको त्याग सकते हैं, न कि वे कामी पुरुष, जो विषयोंके वशमें हैं (उनके गुलाम हैं) और श्रीरघुवीरके चरणोंसे विमुख हैं ॥ ११५ ( क ) ॥

सो०—सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि ।

बिबस होड़ हरिजान नारि बिजु माया प्रगट ॥ ११५ ( ख ) ॥

वे ज्ञानके भण्डार मुनि भी मृगनयनी (युवती स्त्री) के चन्द्रमुखको देखकर विवश (उसके अधीन) हो जाते हैं। हे गरुड़जी! साक्षात् भगवान् विष्णुकी माया ही स्त्रीरूपसे प्रकट है ॥ ११५ ( ख ) ॥