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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 1035, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 1035
  • उत्तरकाण्ड *

१०३३

हे नाथ! हे धीरबुद्धि! पहले तो यह बताइये कि सबसे दुर्लभ कौन-सा शरीर है? फिर सबसे बड़ा दुःख कौन है और सबसे बड़ा सुख कौन है, यह भी विचारकर संक्षेपमें ही कहिये॥ २ ॥

संत असंत मरम तुम्ह जानहु । तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु ॥ कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला । कहहु कवन अघ परम कराला ॥

संत और असंतका मर्म (भेद) आप जानते हैं, उनके सहज स्वभावका वर्णन कीजिये। फिर कहिये कि श्रुतियोंमें प्रसिद्ध सबसे महान् पुण्य कौन-सा है और सबसे महान् भयंकर पाप कौन है? ॥ ३ ॥

मानस रोग कहहु समुझाई । तुम्ह सर्वग्य कृपा अधिकाई ॥ तात सुनुहु सादर अति प्रीती । मैं संछेप कहउँ यह नीती ॥

फिर मानस-रोगोंको समझाकर कहिये। आप सर्वज्ञ हैं और मुझपर आपकी कृपा भी बहुत है। [काकभुशुण्डिजीने कहा—] हे तात! अत्यन्त आदर और प्रेमके साथ सुनिये। मैं यह नीति संक्षेपसे कहता हूँ ॥ ४ ॥

नर तन सम नहीं कवनिउ देही । जीव चराचर जाचत तेही ॥ नरक स्वर्ग अपर्ग निसेनी । ग्यान बिराग भगति सुभ देनी ॥

मनुष्य-शरीरके समान कोई शरीर नहीं है। चर-अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं। यह मनुष्य-शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्षकी सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्तिको देनेवाला है ॥ ५ ॥

सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर । होहिं बिषय रत मंद मंद तर ॥ काँच किरिच बदलें ते लेहीं । कर ते डारि परम मनि देहीं ॥

ऐसे मनुष्य-शरीरको धारण (प्राप्त) करके भी जो लोग श्रीहरिका भजन नहीं करते और नीचसे भी नीच विषयोंमें अनुरक्त रहते हैं, वे पारसमणिको हाथसे फेंक देते हैं और बदलेमें काँचके टुकड़े ले लेते हैं ॥ ६ ॥

नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं । संत मिलन सम सुख जग नाहीं ॥ पर उपकार बचन मन काया । संत सहज सुभाउ खगराया ॥

जगत्में दरिद्रताके समान दुःख नहीं है तथा संतोंके मिलनके समान जगत्में सुख नहीं है। और हे पक्षिराज! मन, वचन और शरीरसे परोपकार करना, यह संतोंका सहज स्वभाव है ॥ ७ ॥

संत सहहिं दुख पर हित लागी । पर दुख हेतु असंत अभागी ॥ भूर्ज तरू सम संत कृपाला । पर हित निति सह बिपति बिसाला ॥