श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1037, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरकाण्ड *
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जो मूर्ख मनुष्य सबकी निन्दा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं। हे तात! अब मानस-रोग सुनिये, जिनसे सब लोग दुःख पाया करते हैं ॥ १४ ॥
मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला । तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला ॥ काम बात कफ लोभ अपारा । क्रोध पित्त नित छाती जारा ॥
सब रोगोंकी जड़ मोह (अज्ञान) है। उन व्याधियोंसे फिर और बहुत-से शूल उत्पन्न होते हैं। काम बात है, लोभ अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है ॥ १५ ॥
प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई । उपजइ सन्यपात दुखदाई ॥ विषय मनोरथ दुर्गम नाना । ते सब सूल नाम को जाना ॥
यदि कहैं ये तीनों भाई (वात, पित्त और कफ) प्रीति कर लें (मिल जायें) तो दुःखदायक सन्निपात रोग उत्पन्न होता है। कठिनतासे प्राप्त (पूर्ण) होनेवाले जो विषयोंके मनोरथ हैं, वे ही सब शूल (कष्टदायक रोग) हैं; उनके नाम कौन जानता है (अर्थात् वे अपार हैं) ॥ १६ ॥
ममता दादु कंडु इरषाई । हरष विषाद गरह बहुताई ॥ पर सुख देखि जरनि सोइ छई । कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई ॥
ममता दाद है, ईर्ष्या (डाह) खुजली है, हर्ष-विषाद गलेके रोगोंकी अधिकता है (गलगंड, कण्ठमाला या घेघा आदि रोग हैं), पराये सुखको देखकर जो जलन होती है, वही क्षयी है। दुष्टता और मनकी कुटिलता ही कोढ़ है ॥ १७ ॥
अहंकार अति दुखद डमरुआ । दंभ कपट मद मान नेहरुआ ॥ तूस्वा उदरवृद्धि अति भारी । त्रिबिधि ईषना तरुन तिजारी ॥
अहंकार अत्यन्त दुःख देनेवाला डमरू (गाँठका) रोग है। दम्भ, कपट, मद और मान नहरुआ (नसोंका) रोग है। तृष्णा बड़ा भारी उदरवृद्धि (जलोदर) रोग है। तीन प्रकार (पुत्र, धन और मान) की प्रबल इच्छाएँ प्रबल तिजारी हैं ॥ १८ ॥
जुग बिधि ज्वर मतसर अबिबेका । कहैं लणि कहौं कुरोग अनेका ॥
मतसर और अविवेक दो प्रकारके ज्वर हैं। इस प्रकार अनेकों बुरे रोग हैं, जिन्हें कहाँतक कहूँ ॥ १९ ॥
दो०—एक व्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु व्याधि ।
पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि ॥ १२१ ( क ) ॥
एक ही रोगके वश होकर मनुष्य मर जाते हैं, फिर ये तो बहुत-से असाध्य रोग हैं। ये जीवको निरन्तर कष्ट देते रहते हैं, ऐसी दशामें वह समाधि (शान्ति) को कैसे प्राप्त करे? ॥ १२१ ( क ) ॥