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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 1039, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 1039
  • उत्तरकाण्ड *

१०३७

बिमल ग्यान जल जब सो नहाई । तब रह राम भगति उर छाई ॥ सिव अज सुक सनकादिक नारद । जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद ॥

[इस प्रकार सब रोगोंसे छूटकर] जब मनुष्य निर्मल ज्ञानरूपी जलमें स्नान कर लेता है, तब उसके हृदयमें रामभक्ति छा रहती है। शिवजी, ब्रह्माजी, शुक्रदेवजी, सनकादि और नारद आदि ब्रह्मविचारमें परम निपुण जो मुनि हैं, ॥ ६ ॥

सब कर मत खगनायक एहा । करिअ राम पद पंकज नेहा ॥ श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं । रघुपति भगति बिना सुख नाहीं ॥

हे पक्षिराज! उन सबका मत यही है कि श्रीरामजीके चरणकमलोंमें प्रेम करना चाहिये। श्रुति, पुराण और सभी ग्रन्थ कहते हैं कि श्रीरघुनाथजीकी भक्तिके बिना सुख नहीं है ॥ ७ ॥

कमठ पीठ जामहिं बरु बारा । बंध्यासुत बरु काहुहि मारा ॥ फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला । जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला ॥

कछुएकी पीठपर भले ही बाल उग आवें, बाँझका पुत्र भले ही किसीको मार डाले, आकाशमें भले ही अनेकों प्रकारके फूल खिल उठें; परन्तु श्रीहरिसे विमुख होकर जीव सुख नहीं प्राप्त कर सकता ॥ ८ ॥

तूषा जाइ बरु मृगजल पाना । बरु जामहिं सस सीस बिषाना ॥ अंधकारु बरु रबिहि नसावै । राम बिमुख न जीव सुख पावै ॥

मृगतृष्णाके जलको पीनेसे भले ही प्यास बुझ जाय, खरगोशके सिरपर भले ही सींग निकल आवें, अन्धकार भले ही सूर्यका नाश कर दे; परन्तु श्रीरामसे विमुख होकर जीव सुख नहीं पा सकता ॥ ९ ॥

हिम ते अनल प्रगट बरु होई । बिमुख राम सुख पाव न कोई ॥

बर्फसे भले ही अग्नि प्रकट हो जाय (ये सब अनहोनी बातें चाहे हो जायें), परन्तु श्रीरामसे विमुख होकर कोई भी सुख नहीं पा सकता ॥ १० ॥

दो०— बारि मर्थें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल ।

बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल ॥ १२२ (क) ॥

जलको मथनेसे भले ही घी उत्पन्न हो जाय और बालू [को पेरेने] से भले ही तेल निकल आवे; परन्तु श्रीहरिके भजन बिना संसाररूपी समुद्रसे नहीं तरा जा सकता, यह सिद्धान्त अटल है ॥ १२२ (क) ॥

मसकहि करइ बिरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन ।

अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन ॥ १२२ (ख) ॥