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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 1041, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 1041
  • उत्तरकाण्ड *

१०३१

यद्यपि मैं सब प्रकारसे हीन (नीच) हूँ, तो भी आज मैं धन्य हूँ, अत्यन्त धन्य हूँ, जो श्रीरामजीने मुझे अपना 'निज जन' जानकर संत-समागम दिया (आपसे मेरी भेंट करायी) ॥ १२३ (क) ॥

नाथ जथामति भाषेउँ राखेउँ नहिं कछु गोड़।

चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पावइ कोड़॥ १२३ (ख) ॥

हे नाथ! मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार कहा, कुछ भी छिपा नहीं रखा। [फिर भी] श्रीरघुवीरके चरित्र समुद्रके समान है; क्या उनकी कोई थाह पा सकता है? ॥ १२३ (ख) ॥

सुमिरि राम के गुन गन नाना । पुनि पुनि हरष भुसुंडि सुजाना ॥ महिमा निगम नेति करि गाई । अतुलित बल प्रताप प्रभुताई ॥

श्रीरामचन्द्रजीके बहुत-से गुणसमूहोंका स्मरण कर-करके सुजान भुशुण्डिजी बार-बार हर्षित हो रहे हैं। जिनकी महिमा वेदोंने 'नेति-नेति' कहकर गायी है; जिनका बल, प्रताप और प्रभुत्व (सामर्थ्य) अतुलनीय है; ॥ १ ॥

सिव अज पूज्य चरन रघुराई । मो पर कृपा परम मृदुलाई ॥ अस सुभाउ कहुँ सुनउँ न देखउँ । केहि खगेस रघुपति सम लेखउँ ॥

जिन श्रीरघुनाथजीके चरण शिवजी और ब्रह्माजीके द्वारा पूज्य हैं, उनकी मुझपर कृपा होनी उनकी परम कोमलता है। किसीका ऐसा स्वभाव कहीं न सुनता हूँ, न देखता हूँ। अतः हे पक्षिराज गरुड़जी! मैं श्रीरघुनाथजीके समान किसे गिन्हूँ (समझूँ)? ॥ २ ॥

साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी । कवि कोबिद कृतग्य संन्यासी ॥ जोगी सूर सुतापस ग्यानी । धर्म निरत पंडित बिग्यानी ॥

साधक, सिद्ध, जीवनमुक्त, उदासीन (विरक्त), कवि, विद्वान्, कर्म [रहस्य] के ज्ञाता, संन्यासी, योगी, शूरवीर, बड़े तपस्वी, ज्ञानी, धर्मपरायण, पण्डित और विज्ञानी ॥ ३ ॥

तरहिं न बिनु सेए मम स्वामी । राम नमामि नमामि नमामी ॥ सरन गाँ मो से अघ रासी । होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी ॥

ये कोई भी मेरे स्वामी श्रीरामजीका सेवन (भजन) किये बिना नहीं तर सकते। मैं उन्हीं श्रीरामजीको बार-बार नमस्कार करता हूँ। जिनकी शरण जानेपर मुझ-जैसे पापराशि भी शुद्ध (पापरहित) हो जाते हैं, उन अबिनाशी श्रीरामजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ४ ॥

दो०—जासु नाम भव भेषज हरन घोर त्रय सूल ।

सो कृपाल मोहि तो पर सदा रहउ अनुकूल ॥ १२४ (क) ॥