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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 1043, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 1043
  • उत्तरकाण्ड *

१०४१

मेरा जीवन और जन्म सफल हो गया। आपकी कृपासे सब सन्देह चला गया। मुझे सदा अपना दास ही जानियेगा। [शिवजी कहते हैं—] हे उमा! पक्षिश्रेष्ठ गरुड़जी बार-बार ऐसा कह रहे हैं ॥५॥

दो०— तासु चरन सिरु नाड़ करि प्रेम सहित मतिधीर ।

गयउ गरुड़ बैकुंठ तब हृदयै राखि रघुबीर ॥ १२५ (क) ॥

उन (भुशुण्डिजी) के चरणोंमें प्रेमसहित सिर नवाकर और हृदयमें श्रीरघुवीरको धारण करके धीरबुद्धि गरुड़जी तब वैकुण्ठको चले गये ॥ १२५ (क) ॥

गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन ।

बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान ॥ १२५ (ख) ॥

हे गिरिजे! संत-समागमके समान दूसरा कोई लाभ नहीं है। पर वह (संत-समागम) श्रीहरिकी कृपाके बिना नहीं हो सकता, ऐसा वेद और पुराण गाते हैं ॥ १२५ (ख) ॥

कहेउँ परम पुनीत इतिहासा । सुनत श्रवन छूटहिं भव पासा ॥

प्रनत कल्पतरु करुना पुंजा । उपजइ प्रीति राम पद कंजा ॥

मैंने यह परम पवित्र इतिहास कहा, जिसे कानोंसे सुनते ही भवपाश (संसारके बन्धन) छूट जाते हैं और शरणागतोंको [उनके इच्छानुसार फल देनेवाले] कल्पवृक्ष तथा दयाके समूह श्रीरामजीके चरणकमलोंमें प्रेम उत्पन्न होता है ॥ १ ॥

मन क्रम बचन जनित अघ जाई । सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई ॥

तीर्थार्टन साधन समुदाई । जोग बिराग ग्यान निपुनाई ॥

जो कान और मन लगाकर इस कथाको सुनते हैं, उनके मन, वचन और कर्म (शरीर) से उत्पन्न सब पाप नष्ट हो जाते हैं। तीर्थयात्रा आदि बहुत-से साधन, योग, वैराग्य और ज्ञानमें निपुणता,— ॥ २ ॥

नाना कर्म धर्म व्रत दाना । संजम दम जप तप मख नाना ॥

भूत दया द्विज गुर सेवकाई । बिद्या विनय बिबेक बड़ाई ॥

अनेकों प्रकारके कर्म, धर्म, व्रत और दान, अनेकों संयम, दम, जप, तप और यज्ञ, प्राणियोंपर दया, ब्राह्मण और गुरुकी सेवा; विद्या, विनय और विवेककी बड़ाई [आदि]— ॥ ३ ॥

जहैं लगि साधन बेद बखानी । सब कर फल हरि भगति भवानी ॥

सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई । राम कृपाँ काहूँ एक पाई ॥

जहाँतक वेदोंने साधन बतलाये हैं, हे भवानी! उन सबका फल श्रीहरिकी भक्ति ही है। किन्तु श्रुतियोंमें गायी हुई वह श्रीरघुनाथजीकी भक्ति श्रीरामजीकी कृपासे किसी एक (विरले) ने ही पायी है ॥ ४ ॥