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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 1045, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 1045
  • उत्तरकाण्ड *

१०४३

मति अनुरूप कथा मैं भाषी । जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी ॥ तव मन प्रीति देखि अधिकाई । तब मैं रघुपति कथा सुनाई ॥

मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार यह कथा कही, यद्यपि पहले इसको छिपाकर रखा था । जब तुम्हारे मनमें प्रेमकी अधिकता देखी तब मैंने श्रीरघुनाथजीकी यह कथा तुमको सुनायी ॥ १ ॥

यह न कहिअ सठही हठसीलहि । जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि ॥ कहिअ न लोभिहि क्रोधिहि कामिहि । जो न भजइ सचराचर स्वामिहि ॥

यह कथा उनसे न कहनी चाहिये जो शठ (धूर्त) हों, हठी स्वभावके हों और श्रीहरिकी लीलाको मन लगाकर न सुनते हों । लोभी, क्रोधी और कामीको, जो चराचरके स्वामी श्रीरामजीको नहीं भजते, यह कथा नहीं कहनी चाहिये ॥ २ ॥

द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ । सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ ॥ राम कथा के तेइ अधिकारी । जिन्ह कें सत संगति अति प्यारी ॥

ब्राह्मणोंके द्रोहीको, यदि वह देवराज (इन्द्र) के समान ऐश्वर्यवान् राजा भी हो, तब भी यह कथा कभी न सुनानी चाहिये । श्रीरामकी कथाके अधिकारी वे ही हैं जिनको सत्संगति अत्यन्त प्रिय है ॥ ३ ॥

गुर पद प्रीति नीति रत जेई । द्विज सेवक अधिकारी तेई ॥ ता कहैं यह बिसेष सुखदाई । जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई ॥

जिनकी गुरुके चरणोंमें प्रीति है, जो नीतिपरायण हैं और ब्राह्मणोंके सेवक हैं, वे ही इसके अधिकारी हैं, और उसको तो यह कथा बहुत ही सुख देनेवाली है, जिसको श्रीरघुनाथजी प्राणके समान प्यारे हैं ॥ ४ ॥

दो०—राम चरन रति जो चह अथवा पद निर्बान ।

भाव सहित सो यह कथा करउ श्रवन पुट पान ॥ १२८ ॥

जो श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम चाहता हो या मोक्षपद चाहता हो, वह इस कथारूपी अमृतको प्रेमपूर्वक अपने कानरूपी दोनेसे पिये ॥ १२८ ॥

राम कथा गिरिजा मैं बरनी । कलि मल समनि मनोमल हरनी ॥ संसृति रोग सजीवन मूरी । राम कथा गावहिं श्रुति सूरौ ॥

हे गिरिजे ! मैंने कलियुगके पापोंका नाश करनेवाली और मनके मलको दूर करनेवाली रामकथाका वर्णन किया । यह रामकथा संसृति (जन्म-मरण)-रूपी रोगके [नाशके] लिये संजीवनी जड़ी है, वेद और विद्वान् पुरुष ऐसा कहते हैं ॥ १ ॥