श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1047, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरकाण्ड *
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एहिं कलिकाल न साधन दूजा । जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा ॥ रामहि सुमिरिअ गाड़अ रामहि । संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि ॥
[तुलसीदासजी कहते हैं—] इस कलिकालमें योग, यज्ञ, जप, तप, ब्रत और पूजन आदि कोई दूसरा साधन नहीं है। बस, श्रीरामजीका ही स्मरण करना, श्रीरामजीका ही गुण गाना और निरन्तर श्रीरामजीके ही गुणसमूहोंको सुनना चाहिये ॥ ३ ॥
जासु पतित पावन बड़ बाना । गावहिं कवि श्रुति संत पुराना ॥ ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई । राम भजें गति केहिं नहिं पाई ॥
पतितोंको पवित्र करना जिनका महान् (प्रसिद्ध) बाना है—ऐसा कवि, वेद, संत और पुराण गाते हैं—रे मन! कुटिलता त्यागकर उन्हींको भज। श्रीरामको भजनेसे किसने परम गति नहीं पायी? ॥ ४ ॥
छं०—पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना । गनिका अजामिल व्याध गीध गजादि खल तारे घना ॥ आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे । कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते ॥
अरे मूर्ख मन! सुन, पतितोंको भी पावन करनेवाले श्रीरामको भजकर किसने परमगति नहीं पायी? गणिका, अजामिल, व्याध, गीध, गज आदि बहुत-से दुष्टोंको उन्होंने तार दिया। आभीर, यवन, किरात, खस, श्वपच (चाण्डाल) आदि जो अत्यन्त पापरूप ही हैं, वे भी केवल एक बार जिनका नाम लेकर पवित्र हो जाते हैं, उन श्रीरामजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥
रघुबंस भूषण चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं । कलि मल मनोमल धोड़ बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं ॥ सत पंच चौपाई मनोहर जानि जो नर उर धरै । दारुन अविद्या पंच जनित बिकार श्री रघुबर हरै ॥
जो मनुष्य रघुवंशके भूषण श्रीरामजीका यह चरित्र कहते हैं, सुनते हैं और गाते हैं, वे कलियुगके पाप और मनके मलको धोकर बिना ही परिश्रम श्रीरामजीके परम धामको चले जाते हैं। [अधिक क्या] जो मनुष्य पाँच-सात चौपाइयोंको भी मनोहर जानकर [अथवा रामायणकी चौपाइयोंको श्रेष्ठ पंच (कर्तव्याकर्तव्यका सच्चा निर्णायक) जानकर उनको] हृदयमें धारण कर लेता है, उसके भी पाँच प्रकारकी अविद्याओंसे उत्पन्न विकारोंको श्रीरामजी हरण कर लेते हैं। (अर्थात् सारे रामचरित्रकी तो बात ही क्या है, जो पाँच-सात चौपाइयोंको भी समझकर उनका अर्थ हृदयमें धारण कर लेते हैं, उनके भी अविद्याजनित सारे क्लेश श्रीरामचन्द्रजी हर लेते हैं) ॥ २ ॥