भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 130

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  • रामचरितमानस *

जिनको निर्गुण-सगुणका कुछ भी विवेक नहीं है, जो अनेक मनगढ़ंत बातें बका करते हैं, जो श्रीहरिकी मायाके वशमें होकर जगत्में (जन्म-मृत्युके चक्रमें) भ्रमते फिरते हैं, उनके लिये कुछ भी कह डालना असम्भव नहीं है ॥ ३ ॥

बातुल भूत बिबस मतवारे । ते नहीं बोलहिं बचन बिचारे ॥ जिन्ह कृत महामोह मद पाना । तिन्ह कर कहा करिअ नहीं काना ॥

जिन्हें वायुका रोग (सन्निपात, उन्माद आदि) हो गया हो, जो भूतके वश हो गये हैं और जो नशेमें चूर हैं, ऐसे लोग विचारकर वचन नहीं बोलते। जिन्होंने महामोहरूपी मदिरा पी रखी है, उनके कहनेपर कान न देना चाहिये ॥ ४ ॥

सो०—अस निज हृदयँ बिचारि तजु संसय भजु राम पद ।

सुनु गिरिराज कुमारि भ्रम तम रबि कर बचन मम ॥ ११५ ॥

अपने हृदयमें ऐसा विचारकर सन्देह छोड़ दो और श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंको भजो। हे पार्वती! भ्रमरूपी अन्धकारके नाश करनेके लिये सूर्यकी किरणोंके समान मेरे वचनोंको सुनो! ॥ ११५ ॥

सगुनहि अगुनहि नहीं कछु भेदा । गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा ॥ अगुन अरूप अलख अज जोई । भगत प्रेम बस सगुन सो होई ॥

सगुण और निर्गुणमें कुछ भी भेद नहीं है—मुनि, पुराण, पण्डित और वेद सभी ऐसा कहते हैं। जो निर्गुण, अरूप (निराकार), अलख (अव्यक्त) और अजन्मा है, वही भक्तोंके प्रेमवश सगुण हो जाता है ॥ १ ॥

जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें । जलु हिम उपल बिलग नहीं जैसें ॥ जासु नाम भ्रम तिमिर पतंगा । तेहि किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा ॥

जो निर्गुण है, वही सगुण कैसे है? जैसे जल और ओलेमें भेद नहीं। (दोनों जल ही हैं, ऐसे ही निर्गुण और सगुण एक ही हैं।) जिसका नाम भ्रमरूपी अन्धकारके मिटानेके लिये सूर्य है, उसके लिये मोहका प्रसंग भी कैसे कहा जा सकता है? ॥ २ ॥

राम सच्चिदानंद दिनेसा । नहीं तहँ मोह निसा लवलेसा ॥ सहज प्रकासरूप भगवाना । नहीं तहँ पुनि बिग्यान बिहाना ॥

श्रीरामचन्द्रजी सच्चिदानन्दस्वरूप सूर्य हैं। वहाँ मोहरूपी रात्रिका लवलेश भी नहीं है। वे स्वभावसे ही प्रकाशरूप और [षडैश्वर्ययुक्त] भगवान् हैं, वहाँ तो विज्ञानरूपी प्रातःकाल भी नहीं होता। (अज्ञानरूपी रात्रि हो तब तो विज्ञानरूपी प्रातःकाल हो; भगवान् तो नित्य ज्ञानस्वरूप हैं।) ॥ ३ ॥