भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 143
  • बालकाण्ड *

१४१

वह सब गुणोंकी खान भगवान्की माया ही थी। उसकी शोभाका वर्णन कैसे किया जा सकता है। वह राजकुमारी स्वयंवर करना चाहती थी, इससे वहाँ अगणित राजा आये हुए थे ॥ ३ ॥

मुनि कौतुकी नगर तेहिं गयऊ । पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ ॥ मुनि सब चरित भूपगृहँ आए । करि पूजा नृप मुनि बैठाए ॥

खिलवाड़ी मुनि नारदजी उस नगरमें गये और नगरवासियोंसे उन्होंने सब हाल पूछा। सब समाचार सुनकर वे राजाके महलमें आये। राजाने पूजा करके मुनिको [आसनपर] बैठाया ॥ ४ ॥

दो०—आनि देखाई नारदहि भूपति राजकुमारि।

कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि ॥ १३० ॥

[फिर] राजाने राजकुमारीको लाकर नारदजीको दिखलाया [और पूछा कि—] हे नाथ! आप अपने हृदयमें विचारकर इसके सब गुण-दोष कहिये ॥ १३० ॥

देखि रूप मुनि बिरति बिसारी । बड़ी बार लगि रहे निहारी ॥ लच्छन तासु बिलोकि भूलाने । हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने ॥

उसके रूपको देखकर मुनि वैराग्य भूल गये और बड़ी देरतक उसकी ओर देखते ही रह गये। उसके लक्षण देखकर मुनि अपने-आपको भी भूल गये और हृदयमें हर्षित हुए, पर प्रकटरूपमें उन लक्षणोंको नहीं कहा ॥ १ ॥

जो एहि बरइ अमर सोइ होई । समरभूमि तेहि जीत न कोई ॥ सेवहिं सकल चराचर ताही । बरइ सीलनिधि कन्या जाही ॥

[लक्षणोंको सोचकर वे मनमें कहने लगे कि] जो इसे ब्याहेगा, वह अमर हो जायगा और रणभूमिमें कोई उसे जीत न सकेगा। यह शीलनिधिकी कन्या जिसको वरेगी, सब चर-अचर जीव उसकी सेवा करेंगे ॥ २ ॥

लच्छन सब बिचारि उर राखे । कछुक बनाइ भूप सन भाषे ॥ सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीं । नारद चले सोच मन माहीं ॥

सब लक्षणोंको विचारकर मुनिने अपने हृदयमें रख लिया और राजासे कुछ अपनी ओरसे बनाकर कह दिया। राजासे लड़कीके सुलक्षण कहकर नारदजी चल दिये। पर उनके मनमें यह चिन्ता थी कि— ॥ ३ ॥

करैं जाइ सोइ जतन बिचारी । जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी ॥ जप तप कछु न होइ तेहि काला । हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला ॥

मैं जाकर सोच-विचारकर अब वही उपाय करूँ, जिससे यह कन्या मुझे ही वरे। इस समय जप-तपसे तो कुछ हो नहीं सकता। हे विधाता! मुझे यह कन्या किस तरह मिलेगी? ॥ ४ ॥