श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 145, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- बालकाण्ड *
१४३
कुपथ माग रुज व्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी॥ एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ॥
हे योगी मुनि! सुनिये, रोगसे व्याकुल रोगी कुपथ माँगे तो वैद्य उसे नहीं देता। इसी प्रकार मैंने भी तुम्हारा हित करनेकी ठान ली है। ऐसा कहकर भगवान् अन्तर्धान हो गये॥ १ ॥
माया बिबस भए मुनि मूढ़। समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़॥ गवने तुरत तहाँ रिषिराई। जहाँ स्वयंबर भूमि बनाई॥
[भगवान्की] मायाके वशीभूत हुए मुनि ऐसे मूढ़ हो गये कि वे भगवान्की अगूढ़ (स्पष्ट) वाणीको भी न समझ सके। ऋषिराज नारदजी तुरंत वहाँ गये जहाँ स्वयंवरकी भूमि बनायी गयी थी॥ २ ॥
निज निज आसन बैठे राजा। बहु बनाव करि सहित समाजा॥ मुनि मन हरष रूप अति मोरें। मोहि तजि आनहि बरिहि न भोरें॥
राजालोग खूब सज-धजकर समाजसहित अपने-अपने आसनपर बैठे थे। मुनि (नारद) मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे कि मेरा रूप बड़ा सुन्दर है, मुझे छोड़ कन्या भूलकर भी दूसरेको न वरेगी॥ ३ ॥
मुनि हित कारन कृपानिधान। दीन्ह कुरुप न जाइ बखाना॥ सो चरित्र लिखि काहुँ न पावा। नारद जानि सबहिं सिर नावा॥
कृपानिधान भगवान्ने मुनिके कल्याणके लिये उन्हें ऐसा कुरुप बना दिया कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता; पर यह चरित्र कोई भी न जान सका। सबने उन्हें नारद ही जानकर प्रणाम किया॥ ४ ॥
दो०—रहे तहाँ दुइ रुद्र गन ते जानहिं सब भेउ।
बिप्रबेष देखत फिरहिं परम कौतुकी तेउ॥ १३३ ॥
वहाँ दो शिवजीके गण भी थे। वे सब भेद जानते थे और ब्राह्मणका वेष बनाकर सारी लीला देखते-फिरते थे। वे भी बड़े मौजी थे॥ १३३ ॥
जेहिं समाज बैठे मुनि जाई। हृदय रूप अहमिति अधिकाई॥ तहाँ बैठे महेस गन दोऊ। बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ॥
नारदजी अपने हृदयमें रूपका बड़ा अभिमान लेकर जिस समाज (पंक्ति) में जाकर बैठे थे, ये शिवजीके दोनों गण भी वही बैठ गये। ब्राह्मणके वेषमें होनेके कारण उनकी इस चालको कोई न जान सका॥ १ ॥
करहिं कूटि नारदहि सुनाई। नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई॥ रीझिहि राजकुअँरि छबि देखी। इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी॥