श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 147, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- बालकाण्ड *
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मोहके कारण मुनिकी बुद्धि नष्ट हो गयी थी, इससे वे [राजकुमारीको गयी देख] बहुत ही विकल हो गये। मानो गाँठसे छूटकर मणि गिर गयी हो। तब शिवजीके गणोंने मुसकराकर कहा—जाकर दर्पणमें अपना मुँह तो देखिये! ॥ ३ ॥
अस कहि दोउ भागे भयँ भारी । बदन दीख मुनि बारि निहारी ॥ बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा । तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा ॥
ऐसा कहकर वे दोनों बहुत भयभीत होकर भागे। मुनिने जलमें झाँककर अपना मुँह देखा। अपना रूप देखकर उनका क्रोध बहुत बढ़ गया। उन्होंने शिवजीके उन गणोंको अत्यन्त कठोर शाप दिया ॥ ४ ॥
दो०—होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ । हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ ॥ १३५ ॥
तुम दोनों कपटी और पापी जाकर राक्षस हो जाओ। तुमने हमारी हँसी की, उसका फल चखो। अब फिर किसी मुनिकी हँसी करना ॥ १३५ ॥
पुनि जल दीख रूप निज पावा । तदपि हृदयँ संतोष न आवा ॥ फरकत अधर कोप मन माहीं । सपदि चले कमलापति पाहीं ॥
मुनिने फिर जलमें देखा, तो उन्हें अपना (असली) रूप प्राप्त हो गया; तब भी उन्हें संतोष नहीं हुआ। उनके ओंठ फड़क रहे थे और मनमें क्रोध [भरा] था। तुरंत ही वे भगवान् कमलापतिके पास चले ॥ १ ॥
देहुउँ श्राप कि मरिहुउँ जाई । जगत मोरि उपहास कराई ॥ बीचहिं पंथ मिले दनुजारी । संग रमा सोड़ राजकुमारी ॥
[मनमें सोचते जाते थे—] जाकर या तो शाप दूँगा या प्राण दे दूँगा। उन्होंने जगत्में मेरी हँसी करायी। दैत्योंके शत्रु भगवान् हरि उन्हें बीच रास्तेमें ही मिल गये। साथमें लक्ष्मीजी और वही राजकुमारी थीं ॥ २ ॥
बोले मधुर बचन सुरसाई । मुनि कहँ चले बिकल की नाई ॥ सुनत बचन उपजा अति क्रोधा । माया बस न रहा मन बोधा ॥
देवताओंके स्वामी भगवान्ने मीठी वाणीमें कहा—हे मुनि! व्याकुलकी तरह कहाँ चले ? ये शब्द सुनते ही नारदको बड़ा क्रोध आया; मायाके वशीभूत होनेके कारण मनमें चेत नहीं रहा ॥ ३ ॥
पर संपदा सकहु नहिं देखी । तुम्हरेँ इरिषा कपट बिसेषी ॥ मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु । सुरन्ह प्रेरि बिष पान करायहु ॥