श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 200, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें१९८
- रामचरितमानस *
स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तून तोरी ॥ चारिउ सील रूप गुन धामा। तदपि अधिक सुखसागर रामा ॥
श्याम और गौर शरीरवाली दोनों सुन्दर जोड़ियोंकी शोभाको देखकर माताएँ तृण तोड़ती हैं [जिसमें दीठ न लग जाय]। यों तो चारों ही पुत्र शील, रूप और गुणके धाम हैं, तो भी सुखके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी सबसे अधिक हैं ॥ ३ ॥
हृदयै अनुग्रह इंदु प्रकासा। सूचत किरन मनोहर हासा ॥ कबहुँ उछंग कबहुँ बर पलना। मातु दुलारइ कहि प्रिय ललना ॥
उनके हृदयमें कृपारूपी चन्द्रमा प्रकाशित है। उनकी मनको हरनेवाली हँसी उस (कृपारूपी चन्द्रमा) की किरणोंको सूचित करती है। कभी गोदमें [लेकर] और कभी उत्तम पालनेमें [लिटकर] माता 'प्यारे ललना!' कहकर दुलार करती है ॥ ४ ॥
दो०—व्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद।
सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या कें गोद ॥ १९८ ॥
जो सर्वव्यापक, निरञ्जन (मायारहित), निर्गुण, विनोदरहित और अजन्मा ब्रह्म हैं, वही प्रेम और भक्तिके वश कौसल्याजीकी गोदमें [खेल रहे] हैं ॥ १९८ ॥
काम कोटि छबि स्याम सरीरा। नील कंज बारिद गंभीरा ॥ अरुन चरन पंकज नख जोती। कमल दलन्हि बैठे जनु मोती ॥
उनके नील कमल और गम्भीर (जलसे भरे हुए) मेघके समान श्याम शरीरमें करोड़ों कामदेवोंकी शोभा है। लाल-लाल चरणकमलोंके नखोंकी [शुभ्र] ज्योति ऐसी मालूम होती है जैसे [लाल] कमलके पत्तोंपर मोती स्थिर हो गये हों ॥ १ ॥
रेख कुलिस ध्वज अंकुस सोहे। नूपुर धुनि सुनि मुनि मन मोहे ॥ कटि किंकिनी उदर त्रय रेखा। नाभि गभीर जान जेहिं देखा ॥
[चरणतलोंमें] वज्र, ध्वजा और अङ्कुशके चिह्न शोभित हैं। नूपुर (पैंजनी) की ध्वनि सुनकर मुनियोंका भी मन मोहित हो जाता है। कमरमें करधनी और पेटपर तीन रेखाएँ (त्रिवली) हैं। नाभिकी गम्भीरताको तो वही जानते हैं जिन्होंने उसे देखा है ॥ २ ॥
भुज बिसाल भूषण जुत भूरी। हिर्यै हरि नख अति सोभा रूरी ॥ उर मनिहार पदिक की सोभा। बिप्र चरन देखत मन लोभा ॥
बहुत-से आभूषणोंसे सुशोभित विशाल भुजाएँ हैं। हृदयपर बाघके नखकी बहुत ही निराली छटा है। छातीपर रत्नोंसे युक्त मणियोंके हारकी शोभा और ब्राह्मण (भृगु) के चरणचिह्नको देखते ही मन लुभा जाता है ॥ ३ ॥