भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 213
  • बालकाण्ड *

२११

तब प्रभुने ऋषियोंसहित [गङ्गाजीमें] स्नान किया। ब्राह्मणोंने भाँति-भाँतिके दान पाये। फिर मुनिवृन्दके साथ वे प्रसन्न होकर चले और शीघ्र ही जनकपुरके निकट पहुँच गये ॥ २ ॥

पुर रम्यता राम जब देखी। हरषे अनुज समेत बिसेषी ॥ बापीं कूप सरित सर नाना। सलिल सुधासम मनि सोपाना ॥

श्रीरामजीने जब जनकपुरकी शोभा देखी, तब वे छोटे भाई लक्ष्मणसहित अत्यन्त हर्षित हुए। वहाँ अनेकों बावलियाँ, कुएँ, नदी और तालाब हैं, जिनमें अमृतके समान जल है और मणियोंकी सीढ़ियाँ [बनी हुई] हैं ॥ ३ ॥

गुंजत मंजु मत्त रस भूंगा। कूजत कल बहुबरन बिहंगा ॥ बरन बरन बिकसे बनजाता। त्रिबिध समीर सदा सुखदाता ॥

मकरन्द-रससे मतबाले होकर भौर सुन्दर गुंजार कर रहे हैं। रंग-बिरंगे [बहुत-से] पक्षी मधुर शब्द कर रहे हैं। रंग-रंगके कमल खिले हैं। सदा (सब ऋतुओंमें) सुख देनेवाला शीतल, मन्द, सुगन्ध पवन बह रहा है ॥ ४ ॥

दो०— सुमन बाटिका बाग बन बिपुल बिहंग निवास।

फूलत फलत सुपल्लवत सोहत पुर चहुँ पास ॥ २१२ ॥

पुष्पवाटिका (फूलवारी), बाग और वन, जिनमें बहुत-से पक्षियोंका निवास है, फूलते, फलते और सुन्दर पत्तोंसे लदे हुए नगरके चारों ओर सुशोभित हैं ॥ २१२ ॥

बनड़ न बरनत नगर निकार्ई। जहाँ जाड़ मन तहँड़ँ लोभाई ॥ चारु बजारु बिचित्र अँवारी। मनिमय बिधि जनु स्वकर सँवारी ॥

नगरकी सुन्दरताका वर्णन करते नहीं बनता। मन जहाँ जाता है; वहाँ लुभा जाता (रम जाता) है। सुन्दर बाजार है, मणियोंसे बने हुए विचित्र छजे हैं, मानो ब्रह्माने उन्हें अपने हाथोंसे बनाया है ॥ १ ॥

धनिक बनिक बर धनद समाना। बैठे सकल बस्तु लै नाना ॥ चौहट सुंदर गलीं सुहाई। संतत रहहिं सुगंध सिंचाई ॥

कुबेरके समान श्रेष्ठ धनी व्यापारी सब प्रकारकी अनेक वस्तुएँ लेकर [दूकानोंमें] बैठे हैं। सुन्दर चौराहे और सुहावनी गलियाँ सदा सुगन्धसे सिंची रहती हैं ॥ २ ॥

मंगलमय मंदिर सब केरें। चित्रित जनु रतिनाथ चितेरें ॥ पुर नर नारि सुभग सुचि संता। धरमसील ग्यानी गुनवंता ॥

सबके घर मङ्गलमय हैं और उनपर चित्र कढ़े हुए हैं, जिन्हें मानो कामदेवरूपी चित्रकारने अंकित किया है। नगरके [सभी] स्त्री-पुरुष सुन्दर, पवित्र, साधु-स्वभाववाले, धर्मात्मा, ज्ञानी और गुणवान् हैं ॥ ३ ॥