श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 239, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- बालकाण्ड *
२३७
सुन्दर चितवन [सारे संसारके मनको हरनेवाले] कामदेवके भी मनको हरनेवाली है। वह हृदयको बहुत ही प्यारी लगती है, पर उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। सुन्दर गाल हैं, कानोंमें चञ्चल (झूमते हुए) कुण्डल हैं। ठोड़ी और अधर (ओठ) सुन्दर हैं, कोमल वाणी है ॥ २ ॥
कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा । भूकुटी बिकट मनोहर नासा ॥ भाल बिसाल तिलक झलकाहीं । कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं ॥
हँसी चन्द्रमाकी किरणोंका तिरस्कार करनेवाली है। भौंहें टेढ़ी और नासिका मनोहर है। [ऊँचे] चौड़े ललाटपर तिलक झलक रहे हैं (दीसिमान् हो रहे हैं)। [काले घुँघराले] बालोंको देखकर भौरोंकी पंक्तियाँ भी लजा जाती हैं ॥ ३ ॥
पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाई । कुसुम कलीं बिच बीच बनाई ॥ रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ । जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ ॥
पीली चौकोनी टोपियाँ सिरोंपर सुशोभित हैं, जिनके बीच-बीचमें फूलोंकी कलियाँ बनायी (काढ़ी) हुई हैं। शङ्खके समान सुन्दर (गोल) गलेमें मनोहर तीन रेखाएँ हैं, जो मानो तीनों लोकोंकी सुन्दरताकी सीमा [को बता रही] हैं ॥ ४ ॥
दो०—कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल । बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल ॥ २४३ ॥
हृदयोंपर गजमुक्ताओंके सुन्दर कण्ठे और तुलसीकी मालाएँ सुशोभित हैं। उनके कंधे बैलोंके कंधेकी तरह [ऊँचे तथा पुष्ट] हैं, ऐंद्र (खड़े होनेकी शान) सिंहकी-सी है और भुजाएँ विशाल एवं बलकी भण्डार हैं ॥ २४३ ॥
कटि तूनीर पीत पट बाँधें । कर सर धनुष बाम बर काँधें ॥ पीत जग्य उपबीत सुहाए । नख सिख मंजु महाछबि छाए ॥
कमरमें तरकस और पीताम्बर बाँधे हैं। [दाहिने] हाथोंमें बाण और बायें सुन्दर कंधोंपर धनुष तथा पीले यज्ञोपवीत (जनेऊ) सुशोभित हैं। नखसे लेकर शिखातक सब अंग सुन्दर हैं, उनपर महान् शोभा छायी हुई है ॥ १ ॥
देखि लोग सब भए सुखारे । एकटक लोचन चलत न तारे ॥ हरषे जनकु देखि दोउ भाई । मुनि पद कमल गहे तब जाई ॥
उन्हें देखकर सब लोग सुखी हुए। नेत्र एकटक (निमेषशून्य) हैं और तारे (पुतलियाँ) भी नहीं चलते। जनकजी दोनों भाइयोंको देखकर हर्षित हुए। तब उन्होंने जाकर मुनिके चरणकमल पकड़ लिये ॥ २ ॥
करि बिनती निज कथा सुनाई । रंग अवनि सब मुनिहि देखाई ॥ जहँ जहँ जाहिँ कुअर बर दोऊ । तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ ॥