भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 242

२४०

  • रामचरितमानस *

ऐसा कहकर अच्छे राजा प्रेममग्न होकर श्रीरामजीका अनुपम रूप देखने लगे। [मनुष्योंकी तो बात ही क्या] देवता लोग भी आकाशसे विमानोंपर चढ़े हुए दर्शन कर रहे हैं और सुन्दर गान करते हुए फूल बरसा रहे हैं ॥ ४ ॥

दो०— जानि सुअवसरु सीय तब पठई जनक बोलाइ।

चतुर सखीं सुंदर सकल सादर चलीं लवाइ ॥ २४६ ॥

तब सुअवसर जानकर जनकजीने सीताजीको बुला भेजा। सब चतुर और सुन्दर सखियाँ आदरपूर्वक उन्हें लिवा चलीं ॥ २४६ ॥

सिय सोभा नहीं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी ॥

उपमा सकल मोहि लघु लागीं। प्राकृत नारि अंग अनुरागीं ॥

रूप और गुणोंकी खान जगज्जननी जानकीजीकी शोभाका वर्णन नहीं हो सकता। उनके लिये मुझे [काव्यकी] सब उपमाएँ तुच्छ लगती हैं; क्योंकि वे लौकिक स्त्रियोंके अंगोंसे अनुराग रखनेवाली हैं (अर्थात् वे जगत्की स्त्रियोंके अंगोंको दी जाती हैं)। [काव्यकी उपमाएँ सब त्रिगुणात्मक, मायिक जगत्से ली गयी हैं, उन्हें भगवान्की स्वरूपाशक्ति श्रीजानकीजीके अप्राकृत, चिन्मय अंगोंके लिये प्रयुक्त करना उनका अपमान करना और अपनेको उपहासास्पद बनाना है] ॥ १ ॥

सिय बरनिअ तेइ उपमा देई। कुकबि कहाइ अजसु को लेई ॥

जौं पटतरिअ तीय सम सीया। जग असि जुबति कहाँ कमनीया ॥

सीताजीके वर्णनमें उन्हीं उपमाओंको देकर कौन कुकबि कहलाये और अपयशका भागी बने (अर्थात् सीताजीके लिये उन उपमाओंका प्रयोग करना सुकविके पदसे च्युत होना और अपकीर्ति मोल लेना है, कोई भी सुकवि ऐसी नादानी एवं अनुचित कार्य नहीं करेगा।) यदि किसी स्त्रीके साथ सीताजीकी तुलना की जाय तो जगत्में ऐसी सुन्दर युवती है ही कहाँ [जिसकी उपमा उन्हें दी जाय] ॥ २ ॥

गिरा मुखर तन अरध भवानी। रति अति दुखित अतनु पति जानी ॥

बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही। कहिअ रमासम किमि बैदेही ॥

[पृथ्वीकी स्त्रियोंकी तो बात ही क्या, देवताओंकी स्त्रियोंको भी यदि देखा जाय तो हमारी अपेक्षा कहीं अधिक दिव्य और सुन्दर हैं, तो उनमें ] सरस्वती तो बहुत बोलनेवाली हैं; पार्वती अर्द्धांगिनी हैं (अर्थात् अर्द्ध-नारिनेटेश्वरके रूपमें उनका आधा ही अंग स्त्रीका है, शेष आधा अंग पुरुष—शिवजीका है), कामदेवकी स्त्री रति पतिको बिना शरीरका (अनंग) जानकर बहुत दुखी रहती है और जिनके विष और मद्य—जैसे [समुद्रसे उत्पन्न होनेके नाते] प्रिय भाई हैं, उन लक्ष्मीके समान तो जानकीजीको कहा ही कैसे जाय ॥ ३ ॥