श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 245, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- बालकाण्ड *
२४३
हे विधाता! जनककी मूढ़ताको शीघ्र हर लीजिये और हमारी ही ऐसी सुन्दर बुद्धि उन्हें दीजिये कि जिससे बिना ही विचार किये राजा अपना प्रण छोड़कर सीताजीका विवाह रामजीसे कर दें ॥ २ ॥
जगु भल कहिहि भाव सब काहू। हठ कीन्हें अंतहुँ उर दाहू ॥ एहिं लालसाँ मगन सब लोगू। बरु साँवरो जानकी जोगू ॥
संसार उन्हें भला कहेगा, क्योंकि यह बात सब किसीको अच्छी लगती है। हठ करनेसे अन्तमें भी हृदय जलेगा। सब लोग इसी लालसामें मग्न हो रहे हैं कि जानकीजीके योग्य वर तो यह साँवला ही है ॥ ३ ॥
तब बंदीजन जनक बोलाए। बिरिदावली कहत चलि आए ॥ कह नृपु जाइ कहहु पन मोरा। चले भाट हियँ हरषु न थोरा ॥
तब राजा जनकने बंदीजनों (भाटों) को बुलाया। वे विरुदावली (वंशकी कीर्ति) गाते हुए चले आये। राजाने कहा—जाकर मेरा प्रण सबसे कहो। भाट चले, उनके हृदयमें कम आनन्द न था ॥ ४ ॥
दो०—बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल।
पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल ॥ २४९ ॥
भाटोंने श्रेष्ठ वचन कहा— हे पृथ्वीकी पालना करनेवाले सब राजागण! सुनिये। हम अपनी भुजा उठाकर जनकजीका विशाल प्रण कहते हैं ॥ २४९ ॥
नृप भुजबलु बिधु सिवधनु राहू। गुरुअ कठोर बिदित सब काहू ॥ रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गर्वहिं सिधारे ॥
राजाओंकी भुजाओंका बल चन्द्रमा है, शिवजीका धनुष राहु है, वह भारी है, कठोर है, यह सबको विदित है। बड़े भारी योद्धा रावण और बाणासुर भी इस धनुषको देखकर गौँसे (चुपके-से) चलते बने (उसे उठाना तो दूर रहा, छूनेतककी हिम्मत न हुई) ॥ १ ॥
सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा। राज समाज आजु जोइ तोरा ॥ त्रिभुवन जय समेत बैदेही। बिनिहिं बिचार बरइ हठि तेही ॥
उसी शिवजीके कठोर धनुषको आज इस राजसमाजमें जो भी तोड़ेगा, तीनों लोकोंकी विजयके साथ ही उसको जानकीजी बिना किसी विचारके हठपूर्वक वरण करेंगी ॥ २ ॥
सुनि पन सकल भूप अभिलाषे। भटमानी अतिसय मन माखे ॥ परिकर बाँधि उठे अकुलाई। चले इष्टदेवन्ह सिर नाई ॥
प्रण सुनकर सब राजा ललचा उठे। जो वीरताके अभिमानी थे, वे मनमें बहुत ही तमतमाये। कमर कसकर अकुलाकर उठे और अपने इष्टदेवोंको सिर नवाकर चले ॥ ३ ॥